तू है कि नहीं?

 

                                  तू है कि नहीं?

अगर टेलीविज़न पर आने वाले धार्मिक धारावाहिकों को देखें तो मन में सवाल उठता है कि क्या कारण है कि प्राचीन काल में ईश्वर के दर्शन और आशीष दुष्कर ज़रूर थे, पर कम से कम प्राप्य तो थे| लेकिन आज किस बात पर वो इतना रूठ गया कि दर्शन तो दूर वो तो कई बार अपने तीर्थगामी अनुयायियों को ही काल के गाल में समा जाने देता है? अब अगर ईश्वर है तो है कहाँ? और अगर सर्वव्यापी है तो रोज़ अर्चना करने पर वरदान न सही, दर्शन मात्र ही क्यों नहीं दे देता? भगवान बुद्ध ने भी यूं तो बहुत कुछ बताया, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष, दोनों ही श्रेणियों की बातों पर बड़ी स्पष्टता से विचार प्रस्तुत किए लेकिन ईश्वर के अस्तित्व पर चुप्पी ही साधे रहे| क्या कारण है कि ईश्वर के चमत्कार सिर्फ युग विशेष में ही संभव थे? क्या हो गया कि ईश्वर के सभी रूपों ने वो सुविधा केंद्र बंद कर दिए?

अगर यह कहा जाए कि कलियुग है, और बढ़ते हुए पाप के माहौल में ईश्वर भी परेशान हो चुका है, इसलिए उसने अपने कानों में रुई डाल ली है| तो भई “अभ्युत्थानमधर्मस्य” की बात तो हमारे वही पूर्वज कह गए हैं जो ईश्वर के समकालीन थे। और जो ईश्वर के अंश के इतना घनिष्ठ थे, उनकी बात तो गलत नहीं हो सकती।

और जब संसार में अन्धकार नित्य बढ़ रहा है तो ईश्वर रूपी प्रकाश और दुर्लभ क्यों हो रहा है? अगर आम बोल-चाल की भाषा में इसका मतलब निकालें तो ईश्वर के खाते में ‘नेग्लिजेंस ऑफ़ ड्यूटी’ या ‘कर्त्तव्य की अवहेलना’ आती है|

मैंने यही बात अपने तर्कवादी मित्र से कही तो उसने पट से महान भौतिक शास्त्री डॉक्टर सुब्रहमण्यम चन्द्रशेखर की बात दोहरा दी – ‘ईश्वर मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ अविष्कार है’। एक वाक्य में उसने मेरे विश्वास के मूल पर ही सवालिया निशान लगा दिया। मैंने कहा अरे क्या बात कर रहे हो। ज़रूरी है कि जो बात वैज्ञानिक सिद्ध न कर पायें वो मिथ्या ही हो? उसने कहा तुम अपनी आस्था का कोई प्रमाण दे सकते हो? मैंने पूरे आत्म विश्वास से कहा बिलकुल दे सकते हैं जनाब।

हमने कहना शुरू किया, हमारे एक मित्र हैं बठिंडा में| उनके दफ्तर के सामने से एक महत्वपूर्ण सड़क गुज़रती है। एक तरफ शहर जिसमें वो रहते हैं और दूसरी ओर कुछ दूरी पर एक मान्यता प्राप्त प्रार्थना घर। कुछ सदी पहले एक आराध्य महापुरुष उसी रास्ते से तत्कालीन शहर आये थे। और देखो उनकी महिमा, आज वो रास्ता एक राजमार्ग है!

अगर उस दफ्तर को केंद्र बिंदु मानें तो प्रार्थना घर की तरफ का रास्ता तो एक दम चका-चक, और शहर की तरफ का रास्ता बिलकुल चिक-चिक! और इसका कारण है एक राक्षस जिसके बारे में मान्यता है कि वो, उन महापुरुष के समकालीन शहर में रहता था| उस राक्षस को उन्होंने शांत करके सभी वासियों को संकट से बचाया था। शहर के लोग आज भी उन महापुरुष का अहसान मानते हैं। बड़ी श्रद्धा से उनकी याद में बनाए प्रार्थना घर जाते हैं। शीश नवाते हैं और आशीष की कामना करते हैं।

अब भी यकीन नहीं हुआ हो तो और सुनो। अनुयायियों की श्रद्धा से प्रसन्न होकर ही ईश्वर ने प्रशासन को स्वप्न दिया, कि रास्ते को चौड़ा किया जाए। यह भी बतलाया होगा कि रास्ते में आने वाली रेल की पटरी श्रद्धालुओं के लिए व्यवधान है। इसलिए उस स्थान पर एक अंडर-पास का निर्माण कराया जाए। फिर क्या था, इंजीनियरों ने तुरंत नक़्शे बनाए, प्रस्ताव पारित कराए और निविदा जारी कर दिए। कुछ महीनों में एक नायाब अंडर पास बनकर तैयार हो गया जिसने यातायात को सहज बना दिया।

तभी मित्र ने कहा, यह वही अंडर-पास था न जिसके बारे में अखबार में मुख्य पृष्ठ पर खबर छपी थी – “पहली बारिश में ही हुआ खँडहरपास”।

मैंने बचाव में कहा – भाई, जिस इलाके का शासक कोई राक्षस रहा हो जिसका वध भी नहीं हुआ, तो वहां के प्रशासन का मति भ्रम होने में कौन बड़ी बात है? जब अंडर-पास बनकर तैयार हुआ तो एक छोटी सी गलती रह गयी थी। उसमें ‘जल रिसन छिद्र’ (वीप होल) बनने से रह गए थे। जब बारिश हुई, तो मिट्टी में पानी भर गया। अब पानी तो अपने बहने का रास्ता ढूंढता ही है। चूंकि दबाव थोड़ा ज़्यादा हो गया तो पहले एक तरफ की आर.सी.सी. दीवार पलटी फिर कुछ दिन बाद दूसरी दीवार भी पलट गयी, बस। लेकिन धन्य हो ऊपर वाले का, कि उन्होंने लोगों पर कृपा रखी और दानव की इस चाल में कोई भी हताहत नहीं हुआ। कुछ हफ्ते लोगों को कठिनाई ज़रूर उठानी पड़ी लेकिन उसके बाद ‘बिजनेस ऐस यूजुअल’ हो गया।

यह सुनकर तर्कवादी मित्र के मुंह से भी निकल पड़ा ….लाख लाख शुक्र है। अभी एक बड़े शहर में तो निर्माणाधीन पुल ही गिर गया, जाने कितने मारे गए और न जाने कितने घायल हुए। काश….. इतना कहकर वो सोच में पड़ गया।

संयोग से तभी हमारे बठिंडा वाले मित्र का फोन आ गया। आवाज़ हिलती हुई आ रही थी तो हमने पूछा अमा, किसी घोड़े पर सवार हो क्या? मित्र ने जवाब दिया, अरे नहीं यार, यह तो दफ्तर से घर की तरफ जा रहे हैं, रास्ता बहुत खुड़बुड़ा है। कमबख्त एक ही बारिश में सड़क टूट जाती है। (मैंने फोन लाउडस्पीकर पर लगाया) रोज़ कोई दुर्घटना – किसी का घुटना छिलता है तो किसी का सिर फूटता है। दर्जनों बार शिकायत दर्ज करा दी, अखबार में फोटो सहित ख़बरें भी छप गईं लेकिन किसी के कान पर जूं नहीं रेंगी। 

मैंने आगे पूछा – और प्रार्थना घर की तरफ का रास्ता भी टूट गया क्या? जवाब आया, नहीं भाई। जाने क्या माजरा है, हर बार दफ्तर से शहर तक की ही सड़क टूटती है। लेकिन अब सब ठीक हो जाएगा| मैंने पूछा वो कैसे? म्युनिसिपालिटी वालों ने लोगों की गुहार सुन ली क्या? उसने कहा अरे भाई, मेला लगने वाला है। रातों रात सड़क बन जाएगी।

तभी फोन कट गया।

हमने अपने तर्कवादी मित्र से कहा, अब तो मानते हो कि भगवान है। भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं। कोई सुने न सुने, भक्त की ऊपर वाला ज़रूर सुनता है। जो सड़क महीनों से राक्षस के प्रकोप से टूटी पड़ी थी, मेले के आते आते स्वतः बन गयी। अब मेले में वोट बटोरने राजनेता तो एक आध ही जाएंगे, लेकिन हज़ारों की तादाद में तो आम भक्त ही पहुंचेंगे। अपने भक्तों के आगमन में कोई दिक्कत न हो इसलिए ईश्वर ने कृपा कर दी।

अपनी बात कहकर मैंने मित्र की तरफ (अब क्या बोलते हो के अंदाज़ में) भृकुटि उचकाई। कुछ क्षण मौन रहने के बाद मेरे स्तब्ध मित्र  ने  कहा, आपने तो मेरी आँखें खोल दीं। ईश्वर हो या नहीं, लेकिन जब तक आप जैसे श्रद्धालु रहेंगे, तदा तदा हि ऐसे चमत्कार भारत भूमि पर होते रहेंगे।

                                                                  ********

  •  अश्रु
Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s