प्रत्यक्ष की खोज

प्रत्यक्ष की खोज

सम्भवतः आप देश की राजधानी नई दिल्ली तो गए ही होंगे। दिल्ली के बीचों-बीच स्थित है कनॉट प्लेस जहाँ आज चारों ओर बहु-मंजिला इमारतें मौजूद हैं। ज्येष्ठ माह की दोपहरी, गर्मी अपने चरम पर पथिकों की चर्म को झुलसा रही थी। कंक्रीट की इमारतें सूर्य से तपकर अपने चारों ओर मौजूद हवा और वाष्प के मिश्रण को भाप के तुल्य बना चुकी थीं। उस चिल-चिलाती गर्मी में यदि आप किसी से ‘प्रत्यक्ष पर सवाल’ पूछें तो स्वाभाविक है कि सामने वाला आपसे सज्जनता से पेश न आए। इस संभावना को भाँपते हुए भी मैंने उस भाप वाले वातावरण में अपने मस्तिष्क में कौंध रही अभिलाषा को पूरा करने का निश्चय कर लिया। कुछ दिन पहले मैंने यह पढ़ा था कि दिल्ली स्थित बाराखम्बा रोड तथा इसी नाम का मेट्रो स्टेशन, एक पंद्रहवीं शताब्दी में निर्मित बारह (12) खम्बों (स्तम्भों) वाली इमारत के के नाम पर आधारित हैं। तब से ही बाराखम्बा के दर्शन की इच्छा हृदय में जाग उठी और उस दिन अपनी इच्छा को पूरा करने का स्वर्णिम अवसर भी था। क्यों न हो, हम बाराखम्बा रोड पर जो खड़े थे। तापमान की परवाह न करते हुए सर्वप्रथम मैंने ‘गूगलदेवता’ को स्मरण किया, किंतु न जाने क्यों मोबाइल पर ‘जी.पी.आर.एस.’ काम नहीं कर रहा था। बिना निराश हुए मैंने वहाँ मौजूद लोगों की सहायता से बाराखम्बा की खोज करने का विचार किया।

मेरी दृष्टि सबसे पहले दुपहिया वाहन पार्किंग के रखवाले पर पड़ी। मैंने उससे वह प्रश्न किया जिसकी शायद उसने कभी कल्पना भी नहीं की होगी। बड़े ही विनम्र स्वर से मैंने कहा – भाई, मुझे बाराखम्बा देखना है, वह कहाँ है?

स्टैंड वाले ने मुस्कराते हुए कहा – ‘भाई साहब, आप बाराखम्बा में खड़े हैं, नज़र उठाइये और देख लीजिए’। मैंने जब उसको बाराखम्बा और बाराखम्बा रोड में अंतर बताया और बाराखम्बा इमारत के विषय में पूछा तो उसने आगे चौराहे की ओर जाने को कहा। उसका धन्यवाद कर मैं चौराहे पर पहुँचा तो वहाँ कुछ न मिला। खैर!

तापमान 43-44 डिग्री सेल्सियस रहा होगा। पैदल भटकने के अनुकूल मौसम तो नहीं था, किंतु इच्छा तो पूरी करनी ही थी। अतः मैंने वहाँ मौजूद यातायात पुलिसकर्मी के सामने यही प्रश्न दोहरा दिया। उसने हरियाणवी लहज़े में यह उत्तर दिया – ‘यो सारो बाराखम्बो ही तो है भाई’। जब पूरी बात बताई तो उसने हार मान ली। इतिहास के जानकार और ऐतिहासिक विषयों में रुचि कम ही लोग रखते हैं, मन ही मन ऐसा सोचकर स्वयं को ढाढस बंधाते हुए मैं ज्यों ही चला, मेरी नज़र एक बुज़ुर्ग नींबू पानी विक्रेता पर पड़ी। उसके पास नींबू पानी पीते हुए मैंने पूछा – ‘बाबा, आप कब से यहाँ दुकान लगाते आ रहे हैं?’ उसने उत्तर दिया – ‘यहीं जवानी से बूढा हुआ हूँ बेटा।‘ यह सुनकर मुझे कुछ उम्मीद बंधी और मैंने अपना सवाल विस्तार से पूछ डाला। सवाल सुनकर बुज़ुर्ग विक्रेता और उसके एक-दो अन्य ग्राहक हँस पड़े। उनकी हँसी ने उत्तर दे दिया कि उत्तर उनके पास नहीं है। मैं भी मुस्कराया और पैसे देकर वहाँ से चल दिया। नींबू पानी वाले से बाराखम्बा का रहस्य तो नहीं सुलझा किंतु अपनी खोज जारी रखने की ताज़गी अवश्य प्राप्त हो गई।

मैंने अपनी खोज जिस स्थान से प्रारंभ की थी, उसी दिशा में बढ़ने लगा तो एक ‘सी.एन.जी. ऑटो’ और भीतर बैठा चालक मिला। मैंने उससे कहा, भाई मुझे बाराखम्बा देखना है, क्या आपको रास्ता पता है? पसीने से लथपथ, उस चालक ने घूमकर मुझे ऐसे देखा मानो मैंने कोई अभद्र व्यवहार कर दिया हो। उसने पूर्वाँचली में कुछ ऐसा जवाब दिया जिसका अर्थ था – आप बाराखम्बा में ही खड़े हैं, क्यों मज़ाक कर रहे हैं? पुनः विस्तार से पूछा तो उसने पुष्टि की – क्या काफी पुरानी इमारत है? खंडहर जैसी दिखती है? मैंने कहा हाँ। उसने तुरंत गर्दन बाहर निकाली और हाथ से इशारा करते हुए कहा – ‘वो जो ऊँचा सा खंडहर है, वही होगा बाराखम्बा। और तो कोई पुरानी इमारत यहाँ है नहीं’। मैंने जब नज़र घुमाई तो बाराखम्बा तो नहीं लेकिन ‘बाराखण्डा’ ज़रूर दिखाई दे गया। वास्तव में वहाँ एक अधूरी छोड़ी गई बारह मंज़िला इमारत का ढाँचा था जो देखने में किसी खंडहर से कम नहीं थी।मेरी भी हंसी छूट गई। निराशा और खुशी की मिश्रित भावनाएं मन में उभरने लगीं।

स्वयं को दिलासा देते हुए, मोबाइल पर इंटरनेट की जाँच करते हुए मैं अंततः अग्निशमन स्टेशन व दफ्तर जा पहुंचा। वहाँ गेट पर कुछ जवान बैठे हुए थे। मैंने उनको अपने आगमन का उद्देश्य बताते हुए कहा कि आप मेरी आखरी उम्मीद हैं क्योंकि आपसे अच्छा शहर के रास्तों को और कोई नहीं जानता। किंतु जब उनसे बाराखम्बा का ज़िक्र किया तो उन्होंने जानकारी से मना कर दिया। फ़िर अचानक उनमें से एक बोल पड़ा, ‘मैं जानूँ हूँ। सीधा चला जा – करीब 500 मीटर, आगे जाकर खब्बे (बाँए) हाथ पड़ेगा थारा बाराखम्बा।‘ मैंने कहा – पक्का? वह बोला बिलकुल पक्का – सौ परसैंट।

रास्ता लम्बा था-मैंने एक गिलास मुसम्मी जूस पिया और आगे बढ़ा। सबसे पहले टॉल्सटॉय मार्ग आया। और आगे जाने पर टोडरमल लेन आई, फिर मॉडर्न स्कूल आया और ईरान का दूतावास आया और फिर बाराखम्बा रोड समाप्त हो गया। लेकिन बाराखम्बा न आया। तपती धूप में एक घण्टे से भी अधिक समय तक ढूंढने पर भी निराशा ही हाथ लगी। मैं उदास था। बाराखम्बा दर्शन का अवसर जो व्यर्थ हो गया था। प्रयास भी जी-तोड़ किया किंतु फल की प्रप्ति फिर भी न हुई। मन में यही ख्याल आया –

                               ”  बाराखम्बा जो देखन मैं चला, बाराखम्बा न मिलियो कोय।

                                 इंटरनेट जो समय पर न चला, खुद से बड़ाज्ञाता न कोय॥”

इस अधूरे अभियान की तह तक पहुंचने की इच्छा अभी भी मन में थी। घर वापस आकर मैंने इंटरनेट पर खोज शुरू की तो पाया कि बाराखम्बा और बाराखम्बा रोड के बीच करीब छः (06) किलोमीटर का फ़ासला है। बाराखम्बा इमारत निज़ामुद्दीन औलिया कॉम्प्लेक्स के पास स्थित है। यह जानकर कई अन्य प्रश्न उठ खड़े हुए –

बाराखम्बा रोड का नाम यह रखने का औचित्य क्या है? यदि मेट्रो स्टेशनों को देखें तो राजीव चौक, रामकृष्ण आश्रममार्ग, झंडेवालान इत्यादि जिस स्थल पर नामित हैं, वह स्थल वहीं मौजूद हैं। आप यह कहेंगे कि टोडरमल और लियो टॉल्सटॉय भी दिल्ली में पैदा नहीं हुए थे फिर उनके नामपर मार्ग क्यों? लेकिन किसी व्यक्ति के सम्मान में मार्ग का नाम चुनना मूलतः भिन्न है। वह व्यक्ति प्रेरणा के स्रोत हैं उनका स्मारक अथवा मार्ग कहीं भी हो सकता है किंतु किसी स्थल के नाम पर मार्ग हो तो आशा करते हैं कि वह स्थल वहीं कहीं होगा।लेकिन धन्य है दिल्ली सरकार और प्रशासन जिसने ऐसा भ्रामक नामकरण किया और वास्तविकता बताने वाला कोई शिला-लेख भी नहीं लगाया। साथ ही धन्य है मानव प्रवृत्ति जो रोज़ काम में लाई जाने वाली वस्तु या रोज़ के गंतव्य के विषय में कभी सोचते ही नहीं। कहते हैं कि मनुष्य एक जिज्ञासु प्राणी है लेकिन सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में हम इंटरनेट पर इस हद तक आश्रित हो चुके हैं कि सिवा अपने रोज़मर्रा के क्रिया-कलापों के और अन्य बातें जानने का हमारे पास समय या कहें इच्छा ही नहीं है। अनभिज्ञता परमानन्द है किंतु सूचना अत्यावश्यक है।

                                                         ******

 – अश्रु

 

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3 Comments

  1. हम देखते तो हैं पर देख नहीं पाते। अमां यार कहाँ भटक रहे थे, इस इंटरनेट के समय में लोगो से पूछना बेवकूफी ही होगा। लोग तो बस जिए जा रहे हैं न जाने क्यों? खैर दाद देनी होगी आपकी हिम्मत की जो इस जेठ की गर्मी के आनंदमयी मौसम में आप इतिहासकर बनने चल दिए।
    वो भी माशाल्लाह दिल्ली जो अब नाम की दिलवाली रह गयी है। पर वृतांत पढ़ कर मजा तो बहुत आया की किस भावी अधिकारी जिसकी पढाई कर रहा है उसे देख भी सका। अगर दिखे तो हमे भी दिखाना।

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    1. वजह फरमाया आपने, इन्टरनेट है तो लोगों का मुंह क्या ताकना| लेकिन क्या ऐसा रवैया वाजिब होगा?

      जवाब तो हमको भी इन्टरनेट से ही मिला| मलाल इसी बात का था इसलिए यहाँ बयान किया|

      सुना है आजकल तो वर्चुअल टूर भी होने लगे हैं| दुआ कीजिये कि आपके सानिध्य में बारहखम्बा देखें|

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