लखनऊ का बड़ा मंगल!

लखनऊ का बड़ा मंगल!

उम्मीद है कि हनुमान जी को तो आप जानते ही होंगे| अरे मिले तो हम भी नहीं लेकिन वही हनुमान भगवान जिनके नाम मात्र से भूत पिशाच निकट नहीं आवें….| तुलसीदास जी की मानें तो हनुमान जी का डंका भू, गगन और पाताल तक में बजता है (तीनों लोक हाँकते काँपें…) जो भी हो, उनके मंदिर और भक्त सारे भारतवर्ष में बड़ी संख्या में पाये जाते हैं| लेकिन लखनऊ शहर से हनुमान जी का अति-विशिष्ट रिश्ता है| क्योंकि इस शहर में हनुमान न सिर्फ पूजनीय हैं बल्कि हरमनप्यारे, कौमी एकता का भी प्रतीक हैं| ज्येष्ठ माह का हर मंगलवार यहाँ बड़ा-मंगल के रूप में मनाया जाता हैं| और इसके पीछे भी एक बड़ा रोचक तथ्य है|

कहते हैं कि आज से कुछ शताब्दी पहले अवध के नवाब का बेटा गंभीर रूप से बीमार हो गया| औलाद अगर कष्ट में हो तो माँ पर जो बीतती है उसका कोई सामी नहीं| कुछ भी कर के वो बस अपनी संतान की सलामती चाहती है| जब हकीमों और वैद्यों ने हाथ खड़े कर दिये तो बेगम अपने बेटे को लेकर अलीगंज के हनुमान मंदिर पहुंची| वहाँ के पुजारी ने कहा कि अपने बेटे को रात भर के लिए मंदिर छोड़ जाए| अगले दिन जब उसने अपने बेटे को     पूर्णतः स्वस्थ पाया तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा| इस चमत्कार के चलते नवाब ने उस माह के हर मंगलवार को बड़ी धूम धाम से मनाया और तब से ही लखनऊ में ज्येष्ठ माह का हर मंगलवार बड़ा हो गया| हर धर्म के अनुयायी बड़े मंगल के आयोजन में हिस्सा लेते हैं| भीषण गर्मी में भूखे को भोजन, प्यासे को पानी और दुखी को मीठे बोल मिल जाएँ तो वाकई वो दिन बड़ा ही होगा|

काफी अरसे बाद मुझे भी लखनऊ में ज्येष्ठ माह बिताने का सौभाग्य प्राप्त हुआ| पहला बड़ा मंगल अभी कुछ दिन दूर था लेकिन अखबारों में उसके इंतेजामात को लेकर सुर्खियां बनी हुई थीं| सूरज उगते ही ‘मंगल’ बड़े होने का बिगुल बजा देता| सुबह से ही लाउडस्पीकरों पर भक्त कुछ सुरीले, कुछ बेसुरे और कुछ बेतुके गाने बजा कर समा बांध देते| जगह-जगह पंडाल लगाकर, भोजन सामाग्री तैयार करने में जुट जाते| प्याऊ भी मुस्तैद हो जाते| दोपहर होते ही हर पंडाल पर लोगों का तांता लगना शुरू हो जाता| और आखिर क्यों न हों? कहते हैं कि भंडारे में भोग लगाना शुभ होता है और भंडारा आयोजित करना पुण्य अर्जक होता है| और अगर कलियुगी दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह एक उत्तम निर्णय है – एक तो भोजन, दूसरे शुभ और शुद्ध (प्रसाद स्वरूप) और तीसरे – असीमित और बिलकुल मुफ्त मिल रहा हो तो किसी को पुण्य कमवाने में क्या जाता है? इसलिए ऐसे मौकों पर लोग आपको पुण्य कमवाने के लिए लालायित रहते हैं| कई तो नाश्ते तक का बलिदान कर देते हैं| कभी लखनऊ आकर पुण्य कमाना हो तो इससे बेहतर मौका नहीं मिलेगा|

खैर, मैं जब दोपहर में घर से निकला तो रास्ते में दर्जनों भंडारे लगे हुए थे| भीषण गर्मी के बीच चारों ओर हर्षोल्लास का माहौल था| हर जगह लोग बड़ी तादाद में भंडारे के आयोजकों की पुण्य-प्राप्ति की मुहीम में सहयोग देने के लिए उमड़े हुए थे| ईश्वर की महिमा देखिये, बड़े से बड़ा स्वाभिमानी व्यक्ति भी ईश्वर के पर्व पर हाथ फैलाकर खाना मांगने में संकोच नहीं करता| लेकिन आसमान छूते पारे में, खुले आसमान के नीचे, गरमा गरम पूड़ी सब्जी का भरपेट भोग लगाना भी कोई आसान काम तो है नहीं, इसलिए कुछ श्रद्धालु अपने सगे संबंधियों को घर छोड़ आये| लेकिन काहे वो भंडारे का भोग खाकर आशीष पाने से वञ्चित रह जाएँ? शायद इसलिए वो अपने साथ एक बड़ा सा बर्तन लाना नहीं भूले|

गंतव्य पर थोड़ा लंबा समय लग गया और लौटते समय तक अंधेरा हो चला था| मन तो मेरा भी बहुत था लेकिन भंडारे में भोग लगाने के लिए भी कुछ अच्छे कर्म किये होने चाहिएं| न पुण्य कमा सके न किसी बंदे को कमवा सके| खैर, लौट के बुद्धू घर को आए|

अगली सुबह तड़के जब मैं अर्धसुप्तावस्था में घर से निकला, तो एक ‘अद्भुत’ दृश्य देख के दंग रह गया। मैंने आँखें मलते हुए गौर से देखा तो प्रतीत हुआ मानो जगह-जगह बर्फबारी हुई है। यह चमत्कार अमूमन हर उस स्थान पर ही हुआ था जहाँ-जहाँ बड़ा-मंगल मनाया गया था। एक पल को तो मैं समझ बैठा कि हनुमान जी ने अपने भक्तों पर कृपा बरसाई है, तभी ज्येष्ठ की दारुण गर्मी में शीतलता भरी हिम अवतरित हुई है। या फिर गणेश जी ने उत्सुक होकर बुधवार को बड़ा करने के लिए चमत्कार दिखाया है।

लेकिन सूरज की तपिश भरी किरणों ने मुझे आभास कराया कि यह कोई साधारण बर्फ नहीं थी और न ही यह हनुमान जी का चमत्कार था। यह तो भक्तों की कठिन साधना का नतीजा था। और तो और लखनऊ ही नहीं, भारत के तमाम शहरों के लिए ऐसी बर्फबारी होना आम बात थी| आखिर श्रद्धा सिर्फ लखनऊ में ही नहीं बसती| दरअसल, वो बर्फ थी थर्माकोल की| भंडारे में प्रयुक्त – कप, प्लेट और कटोरियों के चहुं दिशाओं में अंबार लगे थे|

मैं आगे चलता गया और किसी चलचित्र की भाँति आगे की घटनाएं दिखती चली गयीं। देखते ही देखते सफाई कर्मचारियों ने अपना कर्त्तव्य निभाना आरम्भ किया। पहले तो उन्होंने बिखरे हुए थर्माकोल के बर्तनों को एकत्र किया और फिर उनका होलिका दहन कर दिया। यह अग्नि हवन कुंड की नहीं थी जो हवा को शुद्ध कर रही हो अपितु कई कुंटलों जलते हुए थर्माकोल से निकलने वाली विषाक्त ज्वाला थी।

मुझे याद आया कि एक ज़माने में ऐसे मौकों पर ‘पत्तल’ का प्रयोग होता था। अगर फेंक भी दो तो कुछ समय में खाद बन जाता था। आजकल न जाने क्यों वो ‘आउट ऑफ़ फैशन’ हो गया! कहीं इसलिए तो नहीं कि पेड़ कम रह गए हैं और भक्तों की तादाद ज़्यादा हो गयी है? या फिर कंसम्पशन पर आधारित नवीन अर्थव्यवस्था में सफाई से बनने वाले उत्पादों की कोई जगह नहीं है? फिर मेरी नज़र पास बैठे दुखिया और अब्दुल पर पड़ी| कल तो उनको खाने के लिए प्रचुर मात्रा में भोजन मिल गया, लेकिन आज दोनों मुंह बिचकाए बैठे थे| उनके लिए अगले बड़े मंगल या मोहर्रम या शहीदी दिवस का इंतज़ार शुरू हो गया था| अजीब विडम्बना है, कि पुण्य कमाने के लिए हमारे दिन भी तय हैं| सब लोगों को इन ही गिने चुने दिन भंडारे-प्याऊ लगाने हैं| यह बताइए कि हनुमान जी या खुदा किस बात का आशीर्वाद देते हैं? भूखे को खाना खिलाने के लिए या गिने चुने दिनों में ही भूखे या नहीं भी भूखे को पकवान खिलाने के लिए? अगर साल के हर दिन आप ज़्यादा नहीं सिर्फ किसी एक का पेट भरने की बात तय कर लें तो शायद हनुमान और खुदा अधिक मेहरबान होंगे| लखनऊ के चंद दिन ही बड़े न कहलाकर हर दिल बड़ा कहलाने लगेगा|

मैं यह सब फालतू की बातें सोच ही रहा था कि उस दुर्गन्ध के बीच मेरी नज़र हनुमान जी पर पड़ी। अच्छे स्वास्थ्य का वर देने वाले हनुमान, जो सीना चीर कर सीता-राम के दर्शन कराते नज़र आते थे, अपने सीने में राम-सीता को वापस छुपाते हुए नाक-मुंह ढकते हुए अपनी सेहत बचाने की कोशिश कर रहे थे। मैंने नतमस्तक होकर प्रणाम किया तो आशीर्वाद भी न दे सके।  उनकी प्रतिमा के बगल में ही स्वच्छ भारत अभियान और विश्व पर्यावरण दिवस के पोस्टर झूल रहे थे| यही  हाल रहा तो हनुमानजी कहीं देश छोड़ कर सुमेरु वापस न चले जाएँ।

                                                                     *******

  • अश्रु

|| इति श्री पर्यावरण दिवस शृंखला का द्वितीय अध्याय समाप्त ||  

 

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4 Comments

  1. क्या यही लखनऊ का सुप्रसिद्ध बुढ़वा मंगल है ?

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