सपने – 1, 2 एवं 3

                                                      सपने

बारमेड़ जाने वाली ट्रेन पकड़ने के लिए प्रकाश रेलवे स्टेशन काफ़ी जल्दी आ गया था। स्टेशन पर उसने एक अनारक्षित टिकट खरीदी और ट्रेन के इंतज़ार में बैठ गया। भूख लगने पर वो रेल-आहार की दुकान पर गया और अभी उसने पहला निवाला मुँह में रखा ही था कि एक कोमल स्पर्श ने उसका ध्यानाकर्षित किया। पलट के देखा तो करीब पाँच से छः वर्ष की आशा भरी नज़रें टक टकी लगाए उसे घूर रही थीं। प्रकाश के पलटते ही वह बोला – “बहुत भूख लगी है भैया, दस रुपए दे दो”। 

बच्चे का रूप किसी जोकर से कम न था। काली स्याही से बनी हुई नकली मूँछें, नाक पर लाल रंग का निशान, सिर पर नोकदार टोपी जिससे एक चोटी लटक रही थी और हाथ में एक, एक-फुट व्यास का लोहे का छ्ल्ला। लेकिन गरीबी अभी उसके बचपन पर कुठाराघात नहीं कर पाई थी। उस ‘मेक-अप’ के पीछे उसकी मासूम आँखें उसकी फ़रियाद की सच्चाई बयान कर रहीं थीं। प्रकाश एक मध्यमवर्गीय तीस-बत्तीस साला युवक था। उस बच्चे की जगह अगर कोई और भीख माँग रहा होता तो शायद बिना कुछ सोचे ही वह उसको चलता कर देता लेकिन उस बालक की मासूमियत ने उसको ऐसा करने से रोक दिया।

बिना कोई प्रतिक्रिया किए, प्रकाश ने पहले घड़ी देखी, ट्रेन छूटने में अभी करीब डेढ़ घंटा शेष था। समय बहुतायत में था तो उसने बच्चे से कुछ बातें करने का निश्चय कर लिया। लेकिन प्रकाश का पहला वाक्य मानो उस बच्चे की चरित्र-परीक्षा थी।

वह बोला – “मैं भीख नहीं देता, खासतौर पर बच्चों को बिल्कुल नहीं”।

बच्चा पलट कर विनम्र भाव से बोला – “पैसे न दो, रोटी ही खिला दो”।

इस छोटे से उत्तर ने प्रकाश को स्पष्ट कर दिया कि वह बच्चा भूखा था, झूठा नहीं। प्रकाश ने बच्चे के लिए भी भोजन की थाली खरीद ली। शायद उस बच्चे को भरपेट भोजन कई दिनों बाद नसीब हुआ था क्योंकि खाना खाते समय उसका सारा ध्यान भोजन पर ही केंद्रित था। मैले कपड़ों से सुसज्जित, उस बच्चे को प्रकाश निहारता रहा और बिना कुछ बोले मन ही मन कुछ सोचता रहा। भरपेट खाने के बाद बच्चे ने तृप्त नज़रों से प्रकाश का आभार व्यक्त किया और वहीं बैठा रहा। शायद वो भी प्रकाश के किसी काम आना चाहता था।

दोनों ही एक-दूसरे से बात करना चाहते थे। शुरूआत प्रकाश ने उसका नाम पूछ कर की। बच्चे ने अपनी शर्ट की दाहिनी आस्तीन ऊपर करके दिखाते हुए बताया – कालू। आगे पूछ्ने पर कालू ने अपनी जीवन की छोटी सी किताब खोल के रख दी। वह एक अनाथ था जिसने कभी स्कूल की राह नहीं देखी थी। पेट भरने के लिए ‘मेक-अप’ करके वो चलती रेल में अपनी कलाबाजियों के कमाल दस से बारह डिब्बों के यात्रियों को दिखाता और फिर किसी कलाकार की ही भाँति दर्शकों से अपना पारिश्रमिक माँगता था। बच्चे उसके रूप पर खूब हँसते थे, बड़े भी कलाबाज़ियों का आनंद उठाते थे जिसको वो अपनी सराहना समझकर और भी मनोवेग से दर्शकों के मनोरंजन में जुट जाता था। किंतु पारिश्रमिक के नाम पर कभी किसी की दुत्कार, तो कभी किसी उदार हृदयी के हाथों एक या दो रुपए ही कालू को नसीब होते थे। प्रकाश जैसा कोई व्यक्ति पहले कभी उसको नहीं मिला था जिसने उसके बारे में जानने की कोशिश भी की हो।

प्रकाश ने उससे पूछा कि बड़े होकर वह क्या करना चाहता है, तो उसने तुरंत जवाब दिया कि वह ढेर सारे पैसे और लोगों की इज़्ज़त कमाना चाहता था। प्रकाश ने पूछा कि क्या वह यह सब हासिल करने के लिए उसके साथ चलेगा तो कालू सोच में पड़ गया। प्रकाश ने पूछा क्या सोच रहे हो तो कालू बोला – यहाँ स्टेशन के पास की बस्ती में ही वह अपने कुछ दोस्तों के साथ रहता है। वो सब भी उस ही की तरह रेल-यात्रियों का मनोरंजन करके पैसे कमाते हैं और उनको बिना मिले जाने की बात से वो परेशान था। प्रकाश  ने कहा, कि अब उनसे मिलने का वक्त नहीं बचा है, ट्रेन का प्रस्थान घोषित किया जा रहा है, इसलिए जल्दी फैसला लो| कुछ देर और विचार मंथन और प्रकाश के उज्जवल भविष्य के आश्वासन को सुनकर कालू बोला – मैं साथ चलूँगा।

प्रकाश भी प्रसन्न हो गया। अब ट्रेन चलने में सिर्फ 10 मिनट ही बचे थे, टिकट घर बहुत दूर था।इसलिए बिना टिकट ही यात्रा करना ही एकमात्र चारा था| प्रकाश ने कालू को हाथ-मुँह धोकर इंसान बनने के लिए कहा। कालू दौड़कर गया और मेक-अप साफ करने लग गया। वह अपनी ज़िन्दगी की किताब में नया अध्याय लिखने के लिए बहुत उत्साहित था। चेहरे से उतरती स्याही उसके पुनर्जन्म के समान थी। इस बीच प्रकाश ने अपने किसी परिचित को फ़ोन किया और उससे व्यापार संबंधी बातें करने लगा। अचानक पीछे से कालू दौड़कर आया और बोला – भैया चलें ट्रेन आ गयी”। प्रकाश ने जल्दी – जल्दी फोन बंद किया और ट्रेन रुकते ही अनारक्षित डिब्बे में कालू के साथ चढ़ गया। सौभाग्यवश दोनों को बैठने का स्थान मिल गया और कालू खिड़की वाली सीट पर बैठ गया। थोड़ी ही देर में ट्रेन ने रफ़्तार पकड़ ली और मानो कालू के जीवन ने भी रफ़्तार पकड़ ली हो।

कालू जो रोज़ अपनी ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा ट्रेन पर ही व्यतीत करता था, आज उस ट्रेन में एक कलाबाज़ नहीं अपितु एक यात्री की हैसियत से चढ़ा था और अपने आने वाले भविष्य से अनभिज्ञ, टकटकी लगाए खिड़की से बाहर झाँक रहा था। आज उसकी ज़िंदगी का बहुत बड़ा दिन था, एक पहल थी। अपने स्टेशन से कभी एक स्टेशन आगे या पीछे की ही यात्रा करने वाला कलाबाज़ कालू, आज देखते ही देखते मीलों दूर आ चुका था। आज वो ट्रेन के मटमैले फर्श पर नहीं बल्कि ट्रेन की सीट पर बैठा था। हमेशा खुश ही रहने वाला कालू आज भी खुश था किंतु आज उसकी खुशी का कारण कुछ और था।

सुहाने सपनों के सागर में गोते लगाते हुए कालू अचानक प्रकाश की आवाज़ से हड़बड़ा गया। संध्या हो चुकी थी और प्रकाश उसकी ओर कुछ खाने का पैकेट बढ़ाए खड़ा था। उसने कहा, खाना खा लो और सो जाओ – अभी यात्रा काफी लम्बी है और तुम काफी थके हुए हो। आराम कर लो नहीं तो तबीयत बिग़ड़ जाएगी। कालू ने फिर मन ही मन प्रकाश का अहसान मानते हुए भोजन स्वीकार किया। खाना खाकर वो ऊपर की बर्थ पर लेट गया और थोड़ी देर में सो गया। उस रात कालू खूब सोया। सपने भी खूब देखे। आगे का ट्रेन का सफ़र उस गहरी नींद में उसको पता ही नहीं चला।

और कालू इतना सोया कि………………………फिर कभी नहीं उठा।

तीन दिन बाद बारमेड़ के एक दैनिक समाचार पत्र में चौथे पृष्ठ पर एक खबर छपी –

शहर के बाहर एक और बच्चे का शव बरामद हुआ। गत दिनों में यह तीसरे बच्चे की लाश है। पहले की तरह इस बच्चे के भी अंग गायब हैं और चेहरा पहचान के बाहर है। पोस्ट मॉर्टम से पता चला है कि मरने से पहले इस बच्चे को भी नशीली दवाएं दी गई थीं जिससे स्पष्ट है कि शहर में सक्रिय बच्चों के अंगों के व्यापारी ही इस अपराध के पीछे हैं। शिनाख्त में लाश की दाईं बाँह पर “कालू” लिखा हुआ मिला जो शायद मृतक का नाम है इसके अलावा कोई और सुराग नहीं मिला है

                                                                    *****

                                                                        2

उधर बारमेड़ पुलिस मुख्यालय में पुलिस अधीक्षक पाण्डेय ने आपात मीटिंग बुलाई हुई थी। मीटिंग का मुद्दा था शहर में लगातार हो रही बच्चों की मौत। स्थानीय मीडिया के सक्रिय ‘कवरेज’ और बाल अधिकार सम्बन्धी स्वयं सेवी संस्थाओं के हंगामे के चलते पुलिस की नाकामी तूल पकड़ रही थी। स्कूलों के प्रभारी और अभिभावकों के चिंता भरे सवालों ने प्रशासन पर खासा दबाव बना रखा था। इन्स्पेक्टर इरफ़ान कालू की मौत का केस ‘हेंडल’ कर रहे थे। ‘मीटिंग’ शुरू होते ही पाण्डेय जी गरजे, इन्स्पेक्टर इरफ़ान, तीन हफ़्तों में तीन बच्चों की मौत, और इसके बावजूद पुलिस के पास कोई सुराग नहीं? तहकीकात कहाँ तक पहुँची और क्या इंतेज़ामात किये गए हैं कि अब और कोई बच्चा न मारा जाए?

इन्स्पेक्टर इरफ़ान ने कहना शुरू किया – सर, यह सच है कि पहली दो मौतों के बाद पुलिस को कोई ख़ास सुराग नहीं मिला था और हैरानी की बात यह भी थी कि मौत से पहले या बाद में, बारमेड़ या आस पास के किसी भी जिले में किसी बच्चे की लापता होने की कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं करवाई गयी। लेकिन….

पाण्डेय जी ने बात काटते हुए कहा, यहां अखबार में रोज़ पुलिस की मिट्टी पलीत हो रही है और आप क्या रिपोर्ट लिखवाने का इंतज़ार कर रहे हैं?

नहीं सर। मैं आपको बताना चाह रहा हूँ कि अब तक हमको नहीं पता था कि पीछे मारे गए बच्चों की बैकग्राउंड क्या थी| लेकिन कालू की मौत ने हमारा शक, कि बच्चे कहीं दूर से लाए जा रहे हैं, अब यकीन में बदल दिया है। मरहूम कालू की लाश पर जो कपड़े थे उसकी जेब से हमें रेलवे टी.टी.ई. की काटी हुई जुर्माने की रसीद मिली है। उससे पता लगा कि कालू दिल्ली से ट्रेन में चढ़ा था। हालांकि बारमेड़ रेलवे स्टेशन का सी.सी.टी.वी. खराब होने के कारण फुटेज नहीं मिल सका है। इसलिए अपराधी का सुराग अभी नहीं मिल पाया है। इस बात को मीडिया से फिलहाल छुपाकर रखा गया है।

पाण्डेय जी बोले – फ़ौरन जांच दल दिल्ली रवाना करो। वी नीड एक्शनेबल इंटेलिजेंस। लेकिन इस बात को ध्यान रखना चाहिए कि जुर्म बारमेड़ में हो रहे हैं। दिल्ली से हमको सबूत मिल सकते हैं, लेकिन मुजरिम यहीं बारमेड़ में मिलेंगे।

दो दिन बाद, दिल्ली स्टेशन पर इन्स्पेक्टर इरफ़ान अपने दो सहयोगियों सहित पहुंचे। सबसे पहले उन्होंने कालू के अपहरण वाले दिन ट्रेन के टी.टी.ई. सक्सेना से पूछताछ की। टी.टी.ई. ने बताया कि अनारक्षित डिब्बे में बगैर टिकट चल रहे बच्चे पर उन्होंने जुर्माना लगाया तो उसकी भरपाई उसके किसी बड़े भाई ने की थी। लेकिन उसका हुलिया वो नहीं बता सके।

ट्रेन जिस प्लेटफॉर्म से गई थी, इरफान उस प्लेटफॉर्म पर पूछ-ताछ करने पहुंचे| अब तक की तफ़्तीश में उम्मीद की किरण तब जगी जब प्लेटफॉर्म पर चाय की दुकान पर काम करने वाले कमलेश ने कहा कि वह कालू को जानता है| उसने इरफान की मुलाकात कालू के ही दोस्त हीरा से कारवाई। हीरा, कालू का हम-उम्र साथी था, जो पास की बस्ती में कालू के साथ ही रहता और ट्रेन में साथ करतब भी दिखाता था। उसने इरफ़ान को बताया कि उस दिन जब वो कलाबाज़ी दिखाने ट्रेन में चढ़ा तो कालू ने उसको आवाज़ दी। सीट पर बैठे कालू को देख हीरा ने जब चौंकते हुए पूछा कि वो बिना बताए कहाँ जा रहा है, तो कालू ने उसे प्रकाश से मिलवाया और बताया कि वो उनके साथ अपना भविष्य सँवारने जा रहा था।

फिर पूछताछ खत्म होने के बाद किसी जुदा हुए दोस्त की ही भांति उसने इरफान से पूछा – कालू कैसा है? कहाँ है?

मामले की संजीदगी को देखते हुए इन्स्पेक्टर ने कहा, बेटा, कालू ठीक है। हम अभी प्रकाश को ढूंढ रहे हैँ। क्या तुमने प्रकाश को दोबारा यहाँ देखा? हीरा ने कहा, जी नहीं| फिर इरफान ने प्रकाश का हुलिया पूछा और उसके सहयोगी ने एक स्केच तैयार किया|

इस बीच इरफान के दूसरे साथी ने दिल्ली स्टेशन की सी.सी.टी.वी. फुटेज हासिल की और हीरा के हवाले से मिले प्रकाश के हुलिये वाले आदमी को उसमें ढूंढ निकाला| स्टेशन पर तैनात आर.पी.एफ. और जी.आर.पी. को सतर्क करके हाथ आई इन ‘लीड्स’ के साथ वो वापस बारमेड़ चल पड़ा| रास्ते में उसने एक योजना बनाई|

चूंकि बच्चों को बाहर से अग़वा किया जा रहा था इसलिए बारमेड़ रेलवे स्टेशन और बस अड्डे पर सादी वर्दी में नज़र रखना ज़रूरी था| बारमेड़ रेलवे स्टेशन पर आने-जाने वाले हर आदमी पर कड़ी नज़र रखने के लिए ‘एल.आई.यू.’ की मदद भी ली गयी।

वहीं ‘पोस्ट-मोर्टेम रिपोर्ट’ से पता लगा कि कालू और अन्य दो बच्चों के खून में एक विशेष पदार्थ मिला था जो उचित मात्रा में इस्तेमाल करने से इंसान बेहोश तो होता है लेकिन उसके अंदरूनी अंगों पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता। लेकिन इतनी सफ़ाई से इसका इस्तेमाल कोई कुशल ‘एनस्थीसियोलोजिस्ट’ ही कर सकता था। यह पदार्थ बारमेड़ की सिर्फ दो ही दुकानों पर सख्त नियमों के तहत उपलब्ध था।

इन्स्पेक्टर इरफ़ान ने फ़ौरन इन दुकानों पर पूछताछ की। वहां यह ब्यौरा तो मिल गया कि कब, कौन, कितनी मात्रा में वो पदार्थ ले गया लेकिन किसी ने भी प्रकाश के आने की पुष्टि नहीं की।

खैर इससे शक का दायरा कुछ संकरा होता हुआ नज़र आया।

शठे शाठ्यम्।

इस सूक्ति को चरितार्थ करते हुए इन्स्पेक्टर इरफ़ान ने स्थानीय अखबार में एक इश्तेहार निकाला जिसमें एक AB+ ब्लड ग्रुप वाले बच्चे को अंग प्रत्यारोपण की आवश्यकता बतलाई गयी। तीन दिन बाद दोबारा यही इश्तेहार और भी आग्रहपूर्वक तरीके से छपवाया गया। कुछ दिन बाद दो फोन आये जिसमें अलग अलग अंगदान करने वालों ने बात की। इरफ़ान ने उन नंबरों को ट्रेस करवाया तो एक नंबर दिल्ली और दूसरा राजस्थान का था। लेकिन स्थानीय अखबार में इश्तेहार पढ़कर फोन कहीं दूर से भला कैसे आ सकते थे, दोनों ही कॉल राजस्थान से ही किए गए थे। नंबर किसी फ़र्ज़ी पहचान पत्र पर जारी किये गए थे।

उनहोंने अंगदान की अपनी शर्तें रखीं और एक हफ्ते बाद दोबारा संपर्क करने को कहा।

लेकिन यह एक मुश्किल घड़ी थी। केस को हल करने के जोश में इरफ़ान ने यह कदम उठा तो लिया लेकिन इससे एक और मासूम की ज़िन्दगी खतरे में थी। इस बात का एहसास होकर वो पसो-पेश में था। उसकी तरफ से तैयारी तो पूरी थी। मगर…

यह मगर उसको खाए जा रहा था। क्या एक आदमख़ोर को पकड़ने के लिए किसी इंसान को चारा बनाया जाता है? क्या होगा अगर एक और कालू काल के गाल में समा गया। और क्या होगा अगर कातिल हाथ से फिसल गए? और तो और जब यह बात सामने आएगी तो इसके क्या खामियाजे होंगे? ऐसे कई सवालों ने इरफ़ान के मन में द्वन्द पैदा कर दिया।

लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। बिछाए जाल में खूनी गैंग फंसता नज़र आ रहा था। अब ज़रूरत थी पूरी सावधानी से प्लान को अंजाम देने की| इस नाज़ुक मौके पर यह अंतर्द्वंद किसी भी हाल में सफलता के नजदीक नहीं ले जा रहा था| काफी विचार मंथन के बाद इंस्पेक्टर इरफान ने तय किया कि किसी भी हाल में वो इस गिरोह का पर्दा फ़ाश करके रहेगा| और नतीजा कोई भी हो, इस पूरे वाकये की नैतिक ज़िम्मेदारी लेकर किसी भी परिणाम को झेलेगा|

फिर क्या था, इरफान और उसकी चुनिन्दा टीम पूरे भरोसे के साथ कातिलों को पकड़ने में जुट गए| शक के दायरे में आने वाले सभी लोगों के फोन कॉल रिकॉर्ड करना भी शुरू कर दिये| लेकिन उससे कहीं कोई सुराग नहीं मिला| शायद गैंग कोई इतर नंबरों से आपस में संपर्क साध रहे थे जिनका बोध पुलिस को नहीं था|

तीन दिन बीत गए, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली| कहीं न कहीं इरफान का हौसला जवाब देने लगा था| बढ़ते तनाव के चलते इरफान उठते बैठते सिर्फ एक ही दुआ करता था, कि कातिल कोई न कोई गलती कर बैठे|

दुआ सच्ची हो तो परवरदिगार बंदे की ज़रूर सुनता है!

चौथे दिन दिल्ली से कमलेश का फोन आया कि उसने प्रकाश जैसे किसी आदमी को देखा है| उसने एक फोटो खींच कर इरफान को मेसेंजर पर भी भेजी| इस खबर ने मानो इरफान को नई उम्मीद दे दी| खुदा को याद करके कामयाबी की दुआ करी और पूरे जोश के साथ एक बार फिर वो केस हल करने में जुट गया|

इरफान ने फौरन दिल्ली स्टेशन पर जी.आर.पी. अधिकारियों से संपर्क साधा और उस व्यक्ति पर नज़र रखने को कहा| शक और पुख्ता तब हो गया जब वो एक बच्चे के साथ बारमेड़ की ट्रेन पर सवार हुआ| इरफान ने अपना प्लान स्पष्ट किया कि संदिग्ध पर कड़ी निगाह रखी जाए लेकिन बारमेड़ से पहले ‘इनटरसेप्ट’ न किया जाए|

ट्रेन बारमेड़ रात में पहुंची, लेकिन इरफान अपने साथियों के साथ मुस्तैद था| ट्रेन रुकी, सवारिया उतरीं, लेकिन………..संदिग्ध और कोई बच्चा, वहाँ उतरते नहीं देखे गए|

यह जानकर तो मानो इंस्पेक्टर इरफान के पाँव तले ज़मीन ही खिसक गई|

                                                                  *****

                                                                    3

इरफान को इस वक्त अपनी नहीं बल्कि उस नादान की परवाह थी जिसकी जान इस प्लान के चलते जोखिम में थी। अगर तैयारी हो तो इंसान फौलाद से भी टकरा सकता है। लेकिन इस अप्रत्याशित मोड़ ने इरफान के हौसले को ‌हिला के रख दिया था। स्तब्ध खड़े इरफ़ान को होश तब आया जब पास खड़े सिपाही ने उसको मोबाइल थमाते हुए कहा – सर, कंट्रोल रूम से आपके लिए फ़ोन।

पुलिस कंट्रोल रूम ने बताया कि जिस नम्बर से शुरु में अंग दान के लिये कॉल आया था, वही नम्बर थोड़ी देर पहले पूर्वी बारमेड़ में ट्रेस किया गया है।

सिपाही जसवंत सिंह ने फ़ौरन अपनी राय देते हुए कहा – हो न हो यह ट्रेन वाला शख्स ही है जिसके पास यह फोन है।

इरफ़ान – लेकिन जब ट्रेन से कोई यहाँ उतरा ही नहीं तो ऐसा कैसे हो सकता है?

जसवंत – सर, यह नंबर पूर्वी बारमेड़ में ट्रेस हुआ है। ट्रेन भी पूर्व दिशा से ही आती है। हो सकता है कि मुज़रिम बारमेड़ से पहले उत्तरलाई स्टेशन पर बच्चे समेत उतर गया हो और अपने साथियों के साथ संपर्क साधने के लिए उसने फोन ऑन किया हो।

इरफ़ान – उफ्फ! यह ख्याल पहले क्यों नहीं आया। तुरंत उत्तरलाई रेलवे स्टेशन अधीक्षक (एस.एस.) को अलर्ट करो और निकटतम पुलिस स्टेशन को सचेत करो। और जसवंत, उस नंबर की कॉल ट्रेकिंग जारी रहनी चाहिए। कुछ भी करके हमको इस बच्चे को बचाना है।

जसवंत – यस सर।

उसी समय एस.पी. पांडेय जी का फोन आया। सीधा सवाल था – क्या हुआ? हैज़ द कल्प्रिट बिन कॉट? लेकिन इरफान का जवाब सुनकर वह बौखला गये।

एस.पी. (कड़क आवाज़ में) – मैंने तुमको ऐसा प्लान न बनाने की हिदायत दी थी। दिस चाइल्ड इज़ गोइंग टु बी ए विक्टिम ऑफ यॉर ओवर-कॉन्फिडेंस। क्या इस बात का तुमको ज़रा भी इल्म है?

इरफ़ान – जी सर।

एस.पी. – देन कैच द कल्प्रिट्स एंड ब्रिंग द चाइल्ड अलाइव बाय मॉर्निंग । एल्स, बी रेडी टु फेस एक्शन।

यह कहकर उन्होंने फोन पटक दिया।

इस बीच बारमेड़ एस.एस. से पता लगा कि आज उत्तरलाई से बारमेड़ तक का 10 किमी. का रास्ता ट्रेन ने 40 मिनट के निर्धारित समय के मुक़ाबले सिर्फ 20 मिनट में ही तय कर लिया था इसलिए मुज़रिम के पास उतर कर भागने के लिए अब तक लगभग 35 मिनट का समय मिल चुका था। अपनी गाड़ी का रुख उत्तरलाई स्टेशन की ओर करते हुए उसने उत्तरलाई एस.एस. को फ़ोन लगाया और बात करने लगा|

तभी एक आदमी भागता हुआ उत्तरलाई एस.एस. के कमरे में पहुंचा और उससे इन्स्पेक्टर इरफ़ान को कॉल करने के लिए आग्रह करने लगा। एस.एस. ने फोन उसको पकड़ा दिया।

लाइन पर रेलवे सुरक्षा बल (आर.पी.एफ़.) का जवान रविंदर था। उसकी बातों से अब तक का शक़ यकीन में बदल गया। दरअसल, रविंदर दिल्ली स्टेशन से ही जी.आर.पी. के निर्देशानुसार सादे कपड़ों में संदिग्ध का पीछा कर रहा था। संदिग्ध, बच्चे के साथ, उत्तरलाई स्टेशन पर उतरा। उतरकर उसने पहले कुछ समय स्टेशन पर बिताया – शायद उसके साथियों को वहाँ पहुँचने में देर हो गयी थी इसलिए उसने एक बार किसी को फ़ोन किया। थोड़ी देर में एक सफ़ेद कार आई और उन दोनों को वहाँ से ले गयी जिसका नंबर रविंदर ने इरफ़ान को बता दिया|

इरफान ने थोड़ा झुंझलाते हुए पूछा – इतनी देर तक तुमने मुझे कॉल क्यों नहीं किया?

रविंदर ने बताया कि अचानक हुए इस घटनाक्रम में वह पूरी तैयारी के साथ ट्रेन पर सवार नहीं हो सका था, जिस कारण आधे रास्ते में ही उसका फोन डिस्चार्ज हो गया था। उसने आगे बताया – जब तक संदिग्ध उत्तरलाई स्टेशन पर था, वो काफी रिलैक्स्ड था। शायद उसको पुलिस के ऑपरेशन की भनक नहीं थी। लेकिन जब वह कार में बैठ कर जाने लगा तो वो (रविंदर) नर्वस हो गया और उसके हाव-भाव देख कर बदमाशो को शक हो गया। वो काफी जल्दबाज़ी में वहाँ से भाग निकले। अभी भागे हुए उनको 5 – 6 मिनट ही हुए होंगे। स्टेशन पर रिक्शा के अलावा कोई और साधन भी नहीं था, और इस असहाय स्थिति में वो उनका पीछा भी नहीं कर सकता था। इसलिये भाग कर उसने इरफान को सूचना देना ही ठीक समझा।

जिस बात का डर था, वही हो गया। रविंदर की यह चूक भारी पड़ सकती थी। लेकिन इरफान यह समझता था कि आर.पी.एफ. के जवान इस तरह के खूफिया ऑपरेशंस के लिये ट्रेण्ड नहीं होते। और फिर ओरिजिनल प्लान में उत्तरलाई की सम्भावना उसने खुद नहीं सोची थी, इसलिये वो अपने गुस्से को पी गया और बिना भड़के आगे की कार्यवाही सोचने लगा।

तभी कंट्रोल रूम से संदेश आया कि संदिग्ध ने जिस नम्बर पर कॉल किया था, वो नम्बर उत्तरलाई के एक संजीव राणा का था। उसका एक छोटा सा होटल था जिसमें कई बार गोरखधंधों की शिकायत आती रहती थी।    

एक बार फिर इरफ़ान पसोपेश में था। उसके सामने दो रास्ते थे, एक – कार को जल्द से जल्द इंटरसेप्ट करके बच्चे को बचाया जाए और फिर सबूत इकठ्ठे करके दोषियों को एक एक करके पकड़ा जाए। और दूसरा – ट्रेकिंग जारी रखते हुए आखिरी क्षण तक इंतज़ार किया जाए और ज़्यादा से ज़्यादा गुनाहगारों को मौका-ए-वारदात से रंगे हाथ पकड़ा जाए।

एक समय पासे उसकी पकड़ में आते नज़र आ रहे थे। लेकिन उसकी तैयारी बारमेड़ में थी। प्रकाश और उसके साथी उत्तरलाई में थे। अगर शिकार आपके बिछाए जाल में फंस जाए तो देर सवेर पीछा करके उसको पकड़ना मुमकिन है। लेकिन ऐसे मौके पर जब एक मासूम की जान का सवाल था, एक गलत चाल जीती हुई बाज़ी पलट सकती थी। और तो और, मामला सिर्फ हार या जीत का नहीं था। बड़ी मछली को पकड़ने के लिए क्या इतना बड़ा दांव खेलना सही था? और फिर वो कोई देश की सुरक्षा के लिये प्रतिबद्ध सिपाही तो था नहीं, एक ऐसा नादान था जिसकी सलामती के लिये दुआ करने वाली घर पर माँ तक नहीं थी।

लेकिन अगर सिर्फ प्रकाश को ही पकड़ना था तो दिल्ली स्टेशन पर ही ऐसा किया जा सकता था। इस मौके पर ऐसा करने का मतलब था किये कराये पर पानी फेरना। इस द्वन्द ने इरफ़ान के मन में एक तूफ़ान खड़ा कर रखा था। कश्म्कश की इस हालत में सब सोच विचारकर उसने तय कर लिया कि कैसे भी करके बच्चे को छुड़ाना है।

इरफान की टीम उसके अगले कदम का इंतज़ार था। इरफान ने फौरन उत्तरलाई पुलिस स्टेशन को सम्पर्क किया। इतने कम समय में नाकाबंदी तो की नहीं जा सकती थी इसलिये किस्मत आजमाते हुए उसने राणा के तीनों अड्डों – घर, होटल और गोदाम – पर उसी वक्त धावा बोलने को कहा। वायरलेस पर सभी पुलिस कर्मियों को सचेत किया गया कि जिस भी एरिया में उसी रंग रूप वाली ग़ाड़ी दिखे, फौरन इंफॉर्म करे। वो खुद होटल की ओर बढ़ने लगा। उसको शक़ था कि प्रकाश बच्चे को होटल ही ले जायेगा। थोड़ी देर में वायरलेस पर सूचना आई कि अपराधियों की गाड़ी राणा के होटल की ओर बढ़ते देखी गयी है।

फिर क्या था, इरफान और उसकी टीम ने थोड़ी ही देर में होटल को घेर लिया। और हल्के प्रतिरोध के बाद प्रकाश और उसके दो साथियों को काबू कर लिया।    

बच्चे को होश में लाया गया। उसका नाम श्याम था। मुजरिमों से पूछताछ के दौरान कई लोगों का नाम सामने आए, कुछ के खिलाफ सबूत मिल गए लेकिन कुछ बाइज़्ज़त बरी हो गए।

हांलाकि श्याम की जान तो बच गयी, लेकिन इरफ़ान के इस फैसले से क्या कालू को इन्साफ मिल पाया? ऐसे ही कुछ सुर्खियां और सम्पादकीय बारमेड़ के अखबारों में भी छपे। और इरफान को इसका ज़िम्मेदार भी ठहरा दिया गया। जनता ने भी पुलिस के आरामपरस्ती की गाथाएं गाना शुरु कर दिया। क्यों? क्योंकि सबको सिर्फ परिणाम पता था। उस परिणाम के पीछे का फैसला पता था। लेकिन फैसले के पीछे के हालात सिर्फ चंद लोगों को ही पता थे।

                                                                    *****

इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं। लेकिन इसका हर किरदार वास्तविकता की एक जीती जागती मिसाल है। सैकड़ों प्रकाश अपने चरित्र की कालिमा से सैकड़ों कालुओं को निगलते हैं। न जाने कितने इरफान अपनी जान पर खेल कर किसी के सपनों को टूटने से बचाते हैं लेकिन फिर भी निंदा के पात्र बनते हैं।

  • अश्रु
Advertisements

2 Comments

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s