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मेरे बचपन के सौ किस्से – १. भूत के पाँव|

अगर आप कभी बच्चे रहे होंगे तो यकीनन आपको इस बात से इत्तेफाक होगा कि बचपन वो सुनहरा दौर होता है जब हम होते तो किसी काम के नहीं लेकिन फिर भी सब आपके आगे पीछे भागते फिरते हैं| उस दौर के रहते तो हम विरले ही उसकी अहमियत समझते हैं लेकिन उसके बीत जाने के बाद यदा कदा वो किस्से याद करते हैं जो हमें हँसाते और गुदगुदाते हैं|

“मेरे बचपन के सौ किस्से” श्रृंखला है उन किस्सों की जिसमें मुख्य किरदार लेखक ने खुद निभाया है और जिनको याद रखवाने में परिजनों की विशेष भूमिका है| कोशिश रहेगी कि किस्से उसी क्रम में प्रस्तुत किये जायें जिस क्रम में वो घटित हुए लेकिन यादें उस झिलमिलाती लड़ी की तरह हैं जिनमें कुछ सितारे पहले तो कुछ बाद में भी चमकते हैं|

                                                      मेरे बचपन के सौ किस्से

                                                             #1. भूत के पाँव

बड़े दिनों तक कन्फ्युज़ रहे कि भूत भी कोई पालने की चीज़ है? आये दिन कोई कह देता – भूत के पाँव पालने में नज़र आ जाते हैं’ और हम सोच सोचकर परेशान कि हर कहानी में भूत डरावना होता है तो यह जनाब उसके पाँव देखकर क्यों इतना उछल रहे हैं? पूत पर हावी भूत उतरने में काफ़ी समय लग गया| और कहना मुनासिब होगा कि हमारे अन्दर के एक भूत, मेरा मतलब पूत, की खोज बचपन में ही कर ली गयी थी| वो भूत था कला प्रेम का|

बतौर कला-प्रेमी हमारा लोहा परिवार के सभी लोग मानते थे| मुझे आज भी याद दिलाया जाता है कि किस तरह अम्मा को साड़ी पसंद कराने में मेरी राय सर्वोपरि होती थी| हमारी पसंद की साड़ी उनको भी बेहद पसंद आती, लेकिन इसमें भी दोराय नहीं कि उच्च कोटि की कला का मूल्य भी उच्च ही होता है| यही वजह है कि न जाने कितनी बार माताश्री को अपना मन मारते हुए मेरी पसंद को दरकिनार कर बजटानुसार साड़ी खरीदनी पड़ी|

मगर कला की सराहना करने और उसको हासिल करने के लिए अड़ जाने की गाथायें तो तब रची जाती थीं जब अम्मा हमको कपड़े दिलाने ले चलती थीं| एक बार की बात है, जब किसी शोरूम की शीशा जड़ित डिस्प्ले डेस्क पर बमुश्किल हाथ टिकाकर उचकते हुए ही हम उसके पार देख पाते थे, अम्मा हमको जन्मदिन के लिए कपड़े दिलाने ले चलीं| सारी दुकान के कपड़े छान मारने और सेल्समैन को ‘मैचिंग का मतलब’ सिखाने के बाद हमने एक जोड़ी शर्ट पैन्ट के कपड़े पसंद कर लिये| इतनी देर तक चली जांच परख से तिलमिलाई हुईं अम्मा के सब्र का बाँध तब टूट ही गया जब सेल्समैन ने उसका मूल्य बताया| उसके बाद मचे माँ – पुत्र के घमासान में सेल्समैन तब पिस कर रह गया जब उसने मार्केटिंग स्किल दिखाने की कोशिश में मेरी परख की तारीफ़ कर डाली| मूर्ख! इतना भी नहीं जानता था कि एक उग्र माँ को वो तो क्या, साक्षात डेल कारनेगी भी एक तिनका नहीं बेच सकते|

बताना चाहेंगे कि हम सिर्फ कला के प्रशंसक ही नहीं बल्कि स्वयं एक कलाकार भी थे| थे क्यों और हैं क्यों नहीं इसके पीछे का किस्सा सुनिए|

चित्रकला में हमारी विशेष रूचि थी| रंगों के साथ हम घंटों डूबे रहते| कई बार तो कड़ी मेहनत के बाद अगर कलाकृति से खुद असंतुष्ट रहते तो पन्ना फाड़ देते| किंडरगार्टन (के.जी.) की दूसरी कक्षा की परीक्षायें आरम्भ होने ही वाली थीं कि हमको तेज़ बुखार ने अपनी गिरफ़्त में ले लिया| हमको परीक्षा बाद में देने का ऑप्शन दिया गया| लेकिन किसी वीर सैनिक की ही भाँति हमने प्रतिकूल स्थिति का सामना करना उचित समझा| सामान्यतः परीक्षा का निर्धारित समय पूरा होने तक परीक्षार्थियों को परीक्षा स्थल छोड़ने की अनुमति नहीं होती| लेकिन हमारी नासाज़ सेहत को मद्दे नज़र रखते हुए स्कूल ने इस नियम से हमको राहत दी| परीक्षा में हमको शामिल कराने हमारी माताश्री साथ चलती थीं और उसके समाप्त होने तक वहीं इंतज़ार करती थीं| बिना मोबाइल के उस युग में लोग कैसे समय व्यतीत करते थे, भगवान जाने!

खैर! एक एक करके परीक्षाएं होने लगीं| प्रतिदिन हम जाते और नियत समय से पहले ही परीक्षा स्थल से बाहर आ जाते| गणित की परीक्षा के दिन जब हम आधे ही समय बाद निकल आये, तो अम्मा को लगा ये लुटिया डुबो कर आया है| लेकिन हमने उनको ढाढ़स बंधाया, कि चिंता न करें पूरा पेपर सही करके ही बाहर आये हैं| शायद उसके अगले ही दिन हमारे मनपसंद विषय – चित्रकला – की परीक्षा थी| हर दिन की ही तरह, अम्मा साथ चलीं, और ठीक से चित्र बनाने की नसीहत अपने कलाकार पुत्र को दे डाली| शायद उन्होंने अभी पूत के पाँव नहीं देखे थे| हमने उनको गर्दन ऊपर घुमाकर भौं थोड़ी सी चढ़ाकर एकबार देखा और बिना कुछ बोले आशीर्वाद लेकर भीतर चले गए|

आधे समय के बाद उन्होंने किसी आया के हाथों सन्देश भेजा| टीचर ने जवाब भिजवाया – बच्चा अभी चित्र बना रहा है| आधे घंटे बाद फिर भेजा तो जवाब गया – अब भी बना रहा है| शायद यह उस नसीहत का ही असर था कि ज्वरग्रस्त होते हुए भी परीक्षा के पूरे निर्धारित समय तक हमने चित्रकला की और उस कागज़ में तारे ज़मीन पर ला दिए|

कुछ दिनों में परीक्षा संपन्न हुई| जल्द ही हम ठीक भी हो गए| और फिर दिन आया – परीक्षा के नतीजे का| रिपोर्ट कार्ड लेकर हम घर आये तो लटका हुआ उदास चेहरा देख कर अम्मा पापा समझ गए कि नतीजे में बुखार ने हमको लटका दिया है| उन्होंने बिना कुछ पूछे रिपोर्ट कार्ड देखा तो दंग रह गए| लगभग हर विषय में हम अच्छे अंकों से उत्तीर्ण थे|

फ़िर उदासी क्यों?

हमने आर्ट्स विषय के आगे लिखे ‘सी’ ग्रेड पर उंगली रखकर भौं, नज़रें और गर्दन झुका लीं|

ज़रूरी नहीं कि हर कोई आपके हुनर को सराहने में सक्षम हो| शायद ऐसा ही कुछ हमारे साथ हुआ| शायद हमारी चित्रकला समय से कहीं आगे की थी जो हमारे टीचर कभी समझ ही नहीं पाए और चित्रकला में सी टिकाने का ऐसा सिलसिला किया कि भूत के पाँव हमको भी नज़र आने लगे|

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– अश्रु