ब्रूनो

शर्मा परिवार में आज बड़ी ख़ुशी का दिन था| और आखिर क्योँ न हो? डॉक्टरों के इस परिवार में इकलौता इंजीनियर, वरुण, भारत वापस जो आ रहा था| ग्रेजुएशन के लगभग तुरंत बाद ही, वरुण आगे की पढाई के लिए विदेश चला गया था| परास्नातक (पोस्ट ग्रेजुएशन) की पढाई के बाद वहीं नौकरी में लग गया| और जैसा कि आजकल का ट्रेंड है – क्लास में पढाई के साथ-साथ होने वाली लुगाई भी उसको मिल गयी| अक्सर ऐसे मामलों में लड़का – लड़की एक दूसरे को जानते समझते हैं और इस तालमेल के बीच उनको एक दूसरे की आदत सी हो जाती है| लेकिन बिरले ही वो एक दूसरे को अपना पूरक समझते हैं| जब कोर्स अपने अंतिम चरण में होता है, तब किसी दिन तन्हाई में बैठे सिर पर आ खड़े उस टी-पॉइंट दिखाई देता है जहाँ से आगे का सफ़र अकेले ही तय करना स्पष्ट नज़र आता है| और तब यह सवाल भी ज़हन में गूंजता है कि जब एक तन्हा शाम काटनी इतनी मुश्किल है तो आगे का गुज़ारा कैसे होगा? बेचैनी के उस लम्हे में सबसे पहले उस शख्स का नाम याद आता है जिसकी मौजूदगी भर ही उस पल सुकून देने को काफ़ी होती है| और वो होता है वही पूरक, जिसकी मौजूदगी हर समय थी मगर अहमियत पहली बार समझ आयी थी| वरुण और भावना की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी|

और आज जब वरुण शादी के सात साल बाद भारत वापस आ रहा था तो उसके साथ तीन सदस्य और भी थे| भावना, शर्मा परिवार का कुलदीपक – रोहन और उसका बेस्ट फ्रेंड – ब्रूनो| ब्रूनो लैब्रेडॉर रिट्रीवर प्रजाति का एक खुशमिजाज़ कुत्ता था जिसे वरुण ने रोहन के जन्म के फ़ौरन बाद अडॉप्ट कर लिया था| तीन साल के साथ में, रोहन और ब्रूनो के बीच शायद ही कोई मन-मुटाव हुआ हो| कभी रोहन ब्रूनो की नक़ल उतारता तो कभी ब्रूनो रोहन की| अभी तो रोहन ने ठीक से बोलना भी शुरू नहीं किया था लेकिन ब्रूनो से उसकी खूब बातें होती थीं| इस संवाद में न वाक्य थे, न कोई शब्द, न ही व्याकरण थी| सिर्फ एक संज्ञा थी, कुछ आवाजें, कुछ इशारे, कुछ शरारतें और ढेर सारी खिलखिलाहट| अपनी ही दुनिया में जी रहे रोहन को धीरे धीरे भाषा ज्ञान देने का वक्त हो चला था| अमरीका में रहते, अंग्रेज़ी का ज्ञान सर्वथा ज़रूरी था| तमाम कोशिशों के बाद शब्दावली, व्याकरण और वाक्य-विन्यास पर रोहन ने पकड़ बनाना शुरू कर दिया था| लेकिन अभी यह शुरुआत हो ही पाई थी कि वरुण ने भावना के साथ मिलकर भारत में एक स्टार्ट-अप शुरू करने की सोच ली| वरुण और भावना तो अभी अपनी जड़ों से कटे नहीं थे लेकिन उनको फ़िक्र थी रोहन की, जिसकी पहली जड़ें विदेश में ही छूटी थीं| बंगाल वापस आकर, रोहन को एडजस्ट करने में ज्यादा तकलीफ न हो इसलिए, वरुण ने घर वापसी के लिए गर्मी की छुट्टियों का समय चुना| भारत पहुँचने में बड़ी खुशी का माहौल था| यह उत्सव कुछ दिन चला और फिर सभी लोग निजी व्यस्तताओं में फंस गए| वरुण और भावना अपने बिजनेस आइडिया को फैलाने में, रोहन के दादा-दादी अपनी क्लीनिक और मरीजों में फंसे रहने लगे| 

बचे रोहन और ब्रूनो| दोनों अपनी दुनिया में तो मस्त रहते लेकिन उस दुनिया का दायरा बहुत सीमित था| गिनती के परिवार के लोग ही उसमें शामिल थे| जब भी कोई घर आता तो रोहन को ज़बरदस्ती उनके साथ बैठना पड़ता| बड़े आपस में क्या बात करते उससे उसका कोई सरोकार नहीं था| नज़दीक के पार्क में जाता तो वहाँ भी अकेला रहता| और जब रोहन सामने न होता तो ब्रूनो उसके कमरे में फर्श पे ठुड्डी टिकाये लेटकर उसका इंतज़ार करता| कमरे में रोहन के अलावा कोई और दाखिल होता तो बस एक भौं ऊपर चढ़ा कर देखता और पूँछ हिला देता| सिर्फ जब रोहन के आने की आहट उसे मिलती तो तुरंत उठकर, शरीर को झटक कर बड़ी व्याकुलता से दरवाज़े के पास खड़ा हो जाता| अपने भौंकने से मानो इशारा करता कि जल्दी आओ, जिसे सुनकर रोहन भी दौड़ता हुआ कमरे में आता और फ़ौरन ब्रूनो से लिपट जाता|

देखते देखते एक महीना बीत गया लेकिन रोहन का कोई दोस्त नहीं बन सका| भीड़ में जब तन्हाई का एहसास एक सीमा से ज़्यादा होने लगे तो उसका असर अक्सर सिर चढ़कर बोलता है| नतीजतन, रोहन का व्यवहार भी चिड़चिड़ा होने लगा| खाने में अरुचि, घर पर अनदेखी और दोस्तों की कमी उसको सता रही थी| उस अनजान शहर में ब्रूनो उसका इकलौता दोस्त था लेकिन इशारों में वो उसके साथ कितना ही बाँट सकता था! डांट से उसपर कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा था| रोज़ के इस रवैये से सब परेशान थे, लेकिन किसी के पास फुरसत कहाँ थी? एक दिन जब रोहन ने भावना का लाया हुआ महंगा खिलौना फेंक दिया तो उसने भी तैश में आकर एक झन्नाटेदार थप्पड़ जड़ दिया| रोते हुए रोहन सीधे दादा जी के पास पहुँचा| तमाशा तो वो भी काफ़ी दिन से देख रहे थे मगर समय की किल्लत तो जनाब के पास भी थी| लेकिन इस बार पानी सिर से ऊपर हो गया था| किसी तरह रोहन को पुचकारा और अपने पास ही सुला लिया|

अगले दिन सुबह होते ही दादा जी ने रोहन और ब्रूनो को साथ ले लिया और पार्क चले गए| मॉर्निंग वाक पर मिलने वाले अपने सभी साथियों से नमस्कार कर उनसे अनुमति ली और पार्क में रोहन के साथ बैठ गए| ब्रूनो को उन्होंने खुला छोड़ दिया| ब्रूनो कुछ देर रोहन की ओर टकटकी लगाए देखता रहा कि कब वो दोनों आपस में खेलेंगे लेकिन जब कोई पोज़िटिव रेस्पोंस न मिला तो थोडा दूर निकल गया| बेंच पर अपने दादा के साथ होते हुए भी साथ न था| शायद पिछली शाम के थप्पड़ की तपिश अब भी उसके दिल में भभक रही थी और उसका भाजन बन रही थी पार्क की घास जिसको वो अपने पैरों से रौंदने में मशगूल था| तभी एक गेंद उसकी तरफ आयी| इससे पहले कि वो बच्चे आते, रोहन ने गेंद बिना कुछ सोचे समझे उनकी तरफ फेंक दी और फिर उसी गहन मुद्रा में बैठ गया|

तभी दादाजी ने तेज़ स्वर में रोहन को आवाज़ दी जिससे उसका ध्यान भंग हुआ| फिर दोनों अंग्रेजी में बात करने लगे –

दादा: रोहन तुम तो इस पार्क में रोज़ आते हो|

रोहन: हुम्म|

दा: अकेले आते हो या ब्रूनो के साथ|

रो: मैं रामू भैया के साथ आता हूँ| ब्रूनो आज पहली बार आया है|

दादा: तो तुमने तो बहुत सारे दोस्त बना लिए होंगे| मुझसे मिलवाओगे नहीं?

रो: कोई मेरा दोस्त नहीं है|

दा: क्योँ?

रो: कोई मुझसे बात नहीं करता|

दा: मगर ऐसा क्योँ?

रो: किसी को मेरी और मुझे किसी और की बातें समझ ही नहीं आतीं| इसलिए|

दा: मगर ब्रूनो से तो तुम्हारी खूब जमती है| वो कैसे?

रो: क्योंकि वो मेरी बात समझता है| मैं जो बोलता हूँ, वो वैसा ही करता है|

दा: अच्छा| मतलब ब्रूनो को अंग्रेजी अच्छे से आती है|

रो: हाँ|

दा: लेकिन आजकल ब्रूनो भी उदास रहता है|

रो: (समझाते हुए) हाँ| उसको भी बाकी कुत्तों से बात करने में दिक्कत आ रही होगी न|

दा: लेकिन ब्रूनो कहाँ गया?

रो: वो भी कहीं मिट्टी में गड्ढा खोद रहा होगा|

दादा जी ने इशारा करते हुए कहा: देखो तो, क्या वो ब्रूनो ही है? वो किसके साथ घूम रहा है?

रोहन ने गर्दन उचका के देखा और पाया कि थोड़ी दूरी पर ब्रूनो कुछ और पालतू कुत्तों के साथ मटरगश्ती कर रहा था| ब्रूनो और उसके साथियों को देख कर लग रहा था मानो दोनों पहले भी कई बार मिल चुके हों|

दा: रोहन, ऐसा लगता है कि ब्रूनो के पुराने दोस्त मिल गए हैं|

रो: मगर वो तो आज पहली बार इस पार्क में आया है|

रोहन ने ब्रूनो को आवाज़ लगाई| सुनते ही ब्रूनो ने अपने साथियों को इशारा किया और दौड़ता हुआ रोहन के पास आया| ब्रूनो काफ़ी उत्साहित लग रहा था| पूँछ हिलाते हुए ज़बान निकाले वो रोहन के सामने खड़ा था| बीच बीच में भौंक कर मानो रोहन को अपने साथ चलने का इशारा कर रहा हो|

ब्रूनो की मासूम जिद्द और रोहन के उदासीन रवैये को देखकर दादाजी ने कहा – लगता है ब्रूनो तुमको अपने दोस्तों से मिलवाना चाहता है| चलो चलते हैं|

ब्रूनो के दोस्तों से मिलकर तीनों वापस उसी जगह आकर बैठ गए| तो दादाजी बोले:

रोहन, बता सकते हो ब्रूनो ने पहली मुलाक़ात में ही दोस्त कैसे बना लिए? जब रोहन को कोई जवाब समझ नहीं आया तो उन्होंने समझाते हुए कहा, दोस्ती भाषा की मोहताज नहीं है| दोस्ती होती है आँखों से, मुस्कराहट और इशारों से| एक थाली में इन तीनों को परोसकर दो कदम आगे बढ़ो, सामने वाला दो कदम बढ़कर वो दोस्ती पूरी करेगा| ब्रूनो और तुम एक दूसरे को बखूबी समझते हो, जबकि न वो अंग्रज़ी जानता है न तुम उसकी भाषा| ब्रूनो ने अपने दोस्त तलाशे, वो खुद गया उनको ढूँढने| अगर तुम गेंद दूर से ही न फेंक कर लौटाते बल्कि पांच कदम आगे जाकर देते तो शायद एक दोस्त तुमको भी मिल गया होता|

तभी एक बार फिर एक गेंद रोहन के पास आ गिरी| रोहन ने दादाजी की तरफ देखा और मुस्कराते हुए गेंद लेकर लौटाने के लिए दौड़ कर गया|

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  • अश्रु

 

विशेष धन्यवाद प्रियम्वदा शुक्ला और सौमित्र पन्त|

मशगूल है तू…

मशगूल है तू बहुत,

अब कहाँ फुरसत मेरी खातिर|

हो गुस्ताखी माफ़ मेरी,

जो माँगूं लम्हे उधार अपनी खातिर|

किये तो दावे थे बहुत,

कमस-कम कुछ वादे तो निभा दे|

कब होना है रस्म-ए-रुखसत में शरीक,

इत्तला का एक ज़रिया तो बता दे|

 

                                –  अश्रु