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सपने – 1, 2 एवं 3

                                                      सपने

बारमेड़ जाने वाली ट्रेन पकड़ने के लिए प्रकाश रेलवे स्टेशन काफ़ी जल्दी आ गया था। स्टेशन पर उसने एक अनारक्षित टिकट खरीदी और ट्रेन के इंतज़ार में बैठ गया। भूख लगने पर वो रेल-आहार की दुकान पर गया और अभी उसने पहला निवाला मुँह में रखा ही था कि एक कोमल स्पर्श ने उसका ध्यानाकर्षित किया। पलट के देखा तो करीब पाँच से छः वर्ष की आशा भरी नज़रें टक टकी लगाए उसे घूर रही थीं। प्रकाश के पलटते ही वह बोला – “बहुत भूख लगी है भैया, दस रुपए दे दो”। 

बच्चे का रूप किसी जोकर से कम न था। काली स्याही से बनी हुई नकली मूँछें, नाक पर लाल रंग का निशान, सिर पर नोकदार टोपी जिससे एक चोटी लटक रही थी और हाथ में एक, एक-फुट व्यास का लोहे का छ्ल्ला। लेकिन गरीबी अभी उसके बचपन पर कुठाराघात नहीं कर पाई थी। उस ‘मेक-अप’ के पीछे उसकी मासूम आँखें उसकी फ़रियाद की सच्चाई बयान कर रहीं थीं। प्रकाश एक मध्यमवर्गीय तीस-बत्तीस साला युवक था। उस बच्चे की जगह अगर कोई और भीख माँग रहा होता तो शायद बिना कुछ सोचे ही वह उसको चलता कर देता लेकिन उस बालक की मासूमियत ने उसको ऐसा करने से रोक दिया।

बिना कोई प्रतिक्रिया किए, प्रकाश ने पहले घड़ी देखी, ट्रेन छूटने में अभी करीब डेढ़ घंटा शेष था। समय बहुतायत में था तो उसने बच्चे से कुछ बातें करने का निश्चय कर लिया। लेकिन प्रकाश का पहला वाक्य मानो उस बच्चे की चरित्र-परीक्षा थी।

वह बोला – “मैं भीख नहीं देता, खासतौर पर बच्चों को बिल्कुल नहीं”।

बच्चा पलट कर विनम्र भाव से बोला – “पैसे न दो, रोटी ही खिला दो”।

इस छोटे से उत्तर ने प्रकाश को स्पष्ट कर दिया कि वह बच्चा भूखा था, झूठा नहीं। प्रकाश ने बच्चे के लिए भी भोजन की थाली खरीद ली। शायद उस बच्चे को भरपेट भोजन कई दिनों बाद नसीब हुआ था क्योंकि खाना खाते समय उसका सारा ध्यान भोजन पर ही केंद्रित था। मैले कपड़ों से सुसज्जित, उस बच्चे को प्रकाश निहारता रहा और बिना कुछ बोले मन ही मन कुछ सोचता रहा। भरपेट खाने के बाद बच्चे ने तृप्त नज़रों से प्रकाश का आभार व्यक्त किया और वहीं बैठा रहा। शायद वो भी प्रकाश के किसी काम आना चाहता था।

दोनों ही एक-दूसरे से बात करना चाहते थे। शुरूआत प्रकाश ने उसका नाम पूछ कर की। बच्चे ने अपनी शर्ट की दाहिनी आस्तीन ऊपर करके दिखाते हुए बताया – कालू। आगे पूछ्ने पर कालू ने अपनी जीवन की छोटी सी किताब खोल के रख दी। वह एक अनाथ था जिसने कभी स्कूल की राह नहीं देखी थी। पेट भरने के लिए ‘मेक-अप’ करके वो चलती रेल में अपनी कलाबाजियों के कमाल दस से बारह डिब्बों के यात्रियों को दिखाता और फिर किसी कलाकार की ही भाँति दर्शकों से अपना पारिश्रमिक माँगता था। बच्चे उसके रूप पर खूब हँसते थे, बड़े भी कलाबाज़ियों का आनंद उठाते थे जिसको वो अपनी सराहना समझकर और भी मनोवेग से दर्शकों के मनोरंजन में जुट जाता था। किंतु पारिश्रमिक के नाम पर कभी किसी की दुत्कार, तो कभी किसी उदार हृदयी के हाथों एक या दो रुपए ही कालू को नसीब होते थे। प्रकाश जैसा कोई व्यक्ति पहले कभी उसको नहीं मिला था जिसने उसके बारे में जानने की कोशिश भी की हो।

प्रकाश ने उससे पूछा कि बड़े होकर वह क्या करना चाहता है, तो उसने तुरंत जवाब दिया कि वह ढेर सारे पैसे और लोगों की इज़्ज़त कमाना चाहता था। प्रकाश ने पूछा कि क्या वह यह सब हासिल करने के लिए उसके साथ चलेगा तो कालू सोच में पड़ गया। प्रकाश ने पूछा क्या सोच रहे हो तो कालू बोला – यहाँ स्टेशन के पास की बस्ती में ही वह अपने कुछ दोस्तों के साथ रहता है। वो सब भी उस ही की तरह रेल-यात्रियों का मनोरंजन करके पैसे कमाते हैं और उनको बिना मिले जाने की बात से वो परेशान था। प्रकाश  ने कहा, कि अब उनसे मिलने का वक्त नहीं बचा है, ट्रेन का प्रस्थान घोषित किया जा रहा है, इसलिए जल्दी फैसला लो| कुछ देर और विचार मंथन और प्रकाश के उज्जवल भविष्य के आश्वासन को सुनकर कालू बोला – मैं साथ चलूँगा।

प्रकाश भी प्रसन्न हो गया। अब ट्रेन चलने में सिर्फ 10 मिनट ही बचे थे, टिकट घर बहुत दूर था।इसलिए बिना टिकट ही यात्रा करना ही एकमात्र चारा था| प्रकाश ने कालू को हाथ-मुँह धोकर इंसान बनने के लिए कहा। कालू दौड़कर गया और मेक-अप साफ करने लग गया। वह अपनी ज़िन्दगी की किताब में नया अध्याय लिखने के लिए बहुत उत्साहित था। चेहरे से उतरती स्याही उसके पुनर्जन्म के समान थी। इस बीच प्रकाश ने अपने किसी परिचित को फ़ोन किया और उससे व्यापार संबंधी बातें करने लगा। अचानक पीछे से कालू दौड़कर आया और बोला – भैया चलें ट्रेन आ गयी”। प्रकाश ने जल्दी – जल्दी फोन बंद किया और ट्रेन रुकते ही अनारक्षित डिब्बे में कालू के साथ चढ़ गया। सौभाग्यवश दोनों को बैठने का स्थान मिल गया और कालू खिड़की वाली सीट पर बैठ गया। थोड़ी ही देर में ट्रेन ने रफ़्तार पकड़ ली और मानो कालू के जीवन ने भी रफ़्तार पकड़ ली हो।

कालू जो रोज़ अपनी ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा ट्रेन पर ही व्यतीत करता था, आज उस ट्रेन में एक कलाबाज़ नहीं अपितु एक यात्री की हैसियत से चढ़ा था और अपने आने वाले भविष्य से अनभिज्ञ, टकटकी लगाए खिड़की से बाहर झाँक रहा था। आज उसकी ज़िंदगी का बहुत बड़ा दिन था, एक पहल थी। अपने स्टेशन से कभी एक स्टेशन आगे या पीछे की ही यात्रा करने वाला कलाबाज़ कालू, आज देखते ही देखते मीलों दूर आ चुका था। आज वो ट्रेन के मटमैले फर्श पर नहीं बल्कि ट्रेन की सीट पर बैठा था। हमेशा खुश ही रहने वाला कालू आज भी खुश था किंतु आज उसकी खुशी का कारण कुछ और था।

सुहाने सपनों के सागर में गोते लगाते हुए कालू अचानक प्रकाश की आवाज़ से हड़बड़ा गया। संध्या हो चुकी थी और प्रकाश उसकी ओर कुछ खाने का पैकेट बढ़ाए खड़ा था। उसने कहा, खाना खा लो और सो जाओ – अभी यात्रा काफी लम्बी है और तुम काफी थके हुए हो। आराम कर लो नहीं तो तबीयत बिग़ड़ जाएगी। कालू ने फिर मन ही मन प्रकाश का अहसान मानते हुए भोजन स्वीकार किया। खाना खाकर वो ऊपर की बर्थ पर लेट गया और थोड़ी देर में सो गया। उस रात कालू खूब सोया। सपने भी खूब देखे। आगे का ट्रेन का सफ़र उस गहरी नींद में उसको पता ही नहीं चला।

और कालू इतना सोया कि………………………फिर कभी नहीं उठा।

तीन दिन बाद बारमेड़ के एक दैनिक समाचार पत्र में चौथे पृष्ठ पर एक खबर छपी –

शहर के बाहर एक और बच्चे का शव बरामद हुआ। गत दिनों में यह तीसरे बच्चे की लाश है। पहले की तरह इस बच्चे के भी अंग गायब हैं और चेहरा पहचान के बाहर है। पोस्ट मॉर्टम से पता चला है कि मरने से पहले इस बच्चे को भी नशीली दवाएं दी गई थीं जिससे स्पष्ट है कि शहर में सक्रिय बच्चों के अंगों के व्यापारी ही इस अपराध के पीछे हैं। शिनाख्त में लाश की दाईं बाँह पर “कालू” लिखा हुआ मिला जो शायद मृतक का नाम है इसके अलावा कोई और सुराग नहीं मिला है

                                                                    *****

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उधर बारमेड़ पुलिस मुख्यालय में पुलिस अधीक्षक पाण्डेय ने आपात मीटिंग बुलाई हुई थी। मीटिंग का मुद्दा था शहर में लगातार हो रही बच्चों की मौत। स्थानीय मीडिया के सक्रिय ‘कवरेज’ और बाल अधिकार सम्बन्धी स्वयं सेवी संस्थाओं के हंगामे के चलते पुलिस की नाकामी तूल पकड़ रही थी। स्कूलों के प्रभारी और अभिभावकों के चिंता भरे सवालों ने प्रशासन पर खासा दबाव बना रखा था। इन्स्पेक्टर इरफ़ान कालू की मौत का केस ‘हेंडल’ कर रहे थे। ‘मीटिंग’ शुरू होते ही पाण्डेय जी गरजे, इन्स्पेक्टर इरफ़ान, तीन हफ़्तों में तीन बच्चों की मौत, और इसके बावजूद पुलिस के पास कोई सुराग नहीं? तहकीकात कहाँ तक पहुँची और क्या इंतेज़ामात किये गए हैं कि अब और कोई बच्चा न मारा जाए?

इन्स्पेक्टर इरफ़ान ने कहना शुरू किया – सर, यह सच है कि पहली दो मौतों के बाद पुलिस को कोई ख़ास सुराग नहीं मिला था और हैरानी की बात यह भी थी कि मौत से पहले या बाद में, बारमेड़ या आस पास के किसी भी जिले में किसी बच्चे की लापता होने की कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं करवाई गयी। लेकिन….

पाण्डेय जी ने बात काटते हुए कहा, यहां अखबार में रोज़ पुलिस की मिट्टी पलीत हो रही है और आप क्या रिपोर्ट लिखवाने का इंतज़ार कर रहे हैं?

नहीं सर। मैं आपको बताना चाह रहा हूँ कि अब तक हमको नहीं पता था कि पीछे मारे गए बच्चों की बैकग्राउंड क्या थी| लेकिन कालू की मौत ने हमारा शक, कि बच्चे कहीं दूर से लाए जा रहे हैं, अब यकीन में बदल दिया है। मरहूम कालू की लाश पर जो कपड़े थे उसकी जेब से हमें रेलवे टी.टी.ई. की काटी हुई जुर्माने की रसीद मिली है। उससे पता लगा कि कालू दिल्ली से ट्रेन में चढ़ा था। हालांकि बारमेड़ रेलवे स्टेशन का सी.सी.टी.वी. खराब होने के कारण फुटेज नहीं मिल सका है। इसलिए अपराधी का सुराग अभी नहीं मिल पाया है। इस बात को मीडिया से फिलहाल छुपाकर रखा गया है।

पाण्डेय जी बोले – फ़ौरन जांच दल दिल्ली रवाना करो। वी नीड एक्शनेबल इंटेलिजेंस। लेकिन इस बात को ध्यान रखना चाहिए कि जुर्म बारमेड़ में हो रहे हैं। दिल्ली से हमको सबूत मिल सकते हैं, लेकिन मुजरिम यहीं बारमेड़ में मिलेंगे।

दो दिन बाद, दिल्ली स्टेशन पर इन्स्पेक्टर इरफ़ान अपने दो सहयोगियों सहित पहुंचे। सबसे पहले उन्होंने कालू के अपहरण वाले दिन ट्रेन के टी.टी.ई. सक्सेना से पूछताछ की। टी.टी.ई. ने बताया कि अनारक्षित डिब्बे में बगैर टिकट चल रहे बच्चे पर उन्होंने जुर्माना लगाया तो उसकी भरपाई उसके किसी बड़े भाई ने की थी। लेकिन उसका हुलिया वो नहीं बता सके।

ट्रेन जिस प्लेटफॉर्म से गई थी, इरफान उस प्लेटफॉर्म पर पूछ-ताछ करने पहुंचे| अब तक की तफ़्तीश में उम्मीद की किरण तब जगी जब प्लेटफॉर्म पर चाय की दुकान पर काम करने वाले कमलेश ने कहा कि वह कालू को जानता है| उसने इरफान की मुलाकात कालू के ही दोस्त हीरा से कारवाई। हीरा, कालू का हम-उम्र साथी था, जो पास की बस्ती में कालू के साथ ही रहता और ट्रेन में साथ करतब भी दिखाता था। उसने इरफ़ान को बताया कि उस दिन जब वो कलाबाज़ी दिखाने ट्रेन में चढ़ा तो कालू ने उसको आवाज़ दी। सीट पर बैठे कालू को देख हीरा ने जब चौंकते हुए पूछा कि वो बिना बताए कहाँ जा रहा है, तो कालू ने उसे प्रकाश से मिलवाया और बताया कि वो उनके साथ अपना भविष्य सँवारने जा रहा था।

फिर पूछताछ खत्म होने के बाद किसी जुदा हुए दोस्त की ही भांति उसने इरफान से पूछा – कालू कैसा है? कहाँ है?

मामले की संजीदगी को देखते हुए इन्स्पेक्टर ने कहा, बेटा, कालू ठीक है। हम अभी प्रकाश को ढूंढ रहे हैँ। क्या तुमने प्रकाश को दोबारा यहाँ देखा? हीरा ने कहा, जी नहीं| फिर इरफान ने प्रकाश का हुलिया पूछा और उसके सहयोगी ने एक स्केच तैयार किया|

इस बीच इरफान के दूसरे साथी ने दिल्ली स्टेशन की सी.सी.टी.वी. फुटेज हासिल की और हीरा के हवाले से मिले प्रकाश के हुलिये वाले आदमी को उसमें ढूंढ निकाला| स्टेशन पर तैनात आर.पी.एफ. और जी.आर.पी. को सतर्क करके हाथ आई इन ‘लीड्स’ के साथ वो वापस बारमेड़ चल पड़ा| रास्ते में उसने एक योजना बनाई|

चूंकि बच्चों को बाहर से अग़वा किया जा रहा था इसलिए बारमेड़ रेलवे स्टेशन और बस अड्डे पर सादी वर्दी में नज़र रखना ज़रूरी था| बारमेड़ रेलवे स्टेशन पर आने-जाने वाले हर आदमी पर कड़ी नज़र रखने के लिए ‘एल.आई.यू.’ की मदद भी ली गयी।

वहीं ‘पोस्ट-मोर्टेम रिपोर्ट’ से पता लगा कि कालू और अन्य दो बच्चों के खून में एक विशेष पदार्थ मिला था जो उचित मात्रा में इस्तेमाल करने से इंसान बेहोश तो होता है लेकिन उसके अंदरूनी अंगों पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता। लेकिन इतनी सफ़ाई से इसका इस्तेमाल कोई कुशल ‘एनस्थीसियोलोजिस्ट’ ही कर सकता था। यह पदार्थ बारमेड़ की सिर्फ दो ही दुकानों पर सख्त नियमों के तहत उपलब्ध था।

इन्स्पेक्टर इरफ़ान ने फ़ौरन इन दुकानों पर पूछताछ की। वहां यह ब्यौरा तो मिल गया कि कब, कौन, कितनी मात्रा में वो पदार्थ ले गया लेकिन किसी ने भी प्रकाश के आने की पुष्टि नहीं की।

खैर इससे शक का दायरा कुछ संकरा होता हुआ नज़र आया।

शठे शाठ्यम्।

इस सूक्ति को चरितार्थ करते हुए इन्स्पेक्टर इरफ़ान ने स्थानीय अखबार में एक इश्तेहार निकाला जिसमें एक AB+ ब्लड ग्रुप वाले बच्चे को अंग प्रत्यारोपण की आवश्यकता बतलाई गयी। तीन दिन बाद दोबारा यही इश्तेहार और भी आग्रहपूर्वक तरीके से छपवाया गया। कुछ दिन बाद दो फोन आये जिसमें अलग अलग अंगदान करने वालों ने बात की। इरफ़ान ने उन नंबरों को ट्रेस करवाया तो एक नंबर दिल्ली और दूसरा राजस्थान का था। लेकिन स्थानीय अखबार में इश्तेहार पढ़कर फोन कहीं दूर से भला कैसे आ सकते थे, दोनों ही कॉल राजस्थान से ही किए गए थे। नंबर किसी फ़र्ज़ी पहचान पत्र पर जारी किये गए थे।

उनहोंने अंगदान की अपनी शर्तें रखीं और एक हफ्ते बाद दोबारा संपर्क करने को कहा।

लेकिन यह एक मुश्किल घड़ी थी। केस को हल करने के जोश में इरफ़ान ने यह कदम उठा तो लिया लेकिन इससे एक और मासूम की ज़िन्दगी खतरे में थी। इस बात का एहसास होकर वो पसो-पेश में था। उसकी तरफ से तैयारी तो पूरी थी। मगर…

यह मगर उसको खाए जा रहा था। क्या एक आदमख़ोर को पकड़ने के लिए किसी इंसान को चारा बनाया जाता है? क्या होगा अगर एक और कालू काल के गाल में समा गया। और क्या होगा अगर कातिल हाथ से फिसल गए? और तो और जब यह बात सामने आएगी तो इसके क्या खामियाजे होंगे? ऐसे कई सवालों ने इरफ़ान के मन में द्वन्द पैदा कर दिया।

लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। बिछाए जाल में खूनी गैंग फंसता नज़र आ रहा था। अब ज़रूरत थी पूरी सावधानी से प्लान को अंजाम देने की| इस नाज़ुक मौके पर यह अंतर्द्वंद किसी भी हाल में सफलता के नजदीक नहीं ले जा रहा था| काफी विचार मंथन के बाद इंस्पेक्टर इरफान ने तय किया कि किसी भी हाल में वो इस गिरोह का पर्दा फ़ाश करके रहेगा| और नतीजा कोई भी हो, इस पूरे वाकये की नैतिक ज़िम्मेदारी लेकर किसी भी परिणाम को झेलेगा|

फिर क्या था, इरफान और उसकी चुनिन्दा टीम पूरे भरोसे के साथ कातिलों को पकड़ने में जुट गए| शक के दायरे में आने वाले सभी लोगों के फोन कॉल रिकॉर्ड करना भी शुरू कर दिये| लेकिन उससे कहीं कोई सुराग नहीं मिला| शायद गैंग कोई इतर नंबरों से आपस में संपर्क साध रहे थे जिनका बोध पुलिस को नहीं था|

तीन दिन बीत गए, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली| कहीं न कहीं इरफान का हौसला जवाब देने लगा था| बढ़ते तनाव के चलते इरफान उठते बैठते सिर्फ एक ही दुआ करता था, कि कातिल कोई न कोई गलती कर बैठे|

दुआ सच्ची हो तो परवरदिगार बंदे की ज़रूर सुनता है!

चौथे दिन दिल्ली से कमलेश का फोन आया कि उसने प्रकाश जैसे किसी आदमी को देखा है| उसने एक फोटो खींच कर इरफान को मेसेंजर पर भी भेजी| इस खबर ने मानो इरफान को नई उम्मीद दे दी| खुदा को याद करके कामयाबी की दुआ करी और पूरे जोश के साथ एक बार फिर वो केस हल करने में जुट गया|

इरफान ने फौरन दिल्ली स्टेशन पर जी.आर.पी. अधिकारियों से संपर्क साधा और उस व्यक्ति पर नज़र रखने को कहा| शक और पुख्ता तब हो गया जब वो एक बच्चे के साथ बारमेड़ की ट्रेन पर सवार हुआ| इरफान ने अपना प्लान स्पष्ट किया कि संदिग्ध पर कड़ी निगाह रखी जाए लेकिन बारमेड़ से पहले ‘इनटरसेप्ट’ न किया जाए|

ट्रेन बारमेड़ रात में पहुंची, लेकिन इरफान अपने साथियों के साथ मुस्तैद था| ट्रेन रुकी, सवारिया उतरीं, लेकिन………..संदिग्ध और कोई बच्चा, वहाँ उतरते नहीं देखे गए|

यह जानकर तो मानो इंस्पेक्टर इरफान के पाँव तले ज़मीन ही खिसक गई|

                                                                  *****

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इरफान को इस वक्त अपनी नहीं बल्कि उस नादान की परवाह थी जिसकी जान इस प्लान के चलते जोखिम में थी। अगर तैयारी हो तो इंसान फौलाद से भी टकरा सकता है। लेकिन इस अप्रत्याशित मोड़ ने इरफान के हौसले को ‌हिला के रख दिया था। स्तब्ध खड़े इरफ़ान को होश तब आया जब पास खड़े सिपाही ने उसको मोबाइल थमाते हुए कहा – सर, कंट्रोल रूम से आपके लिए फ़ोन।

पुलिस कंट्रोल रूम ने बताया कि जिस नम्बर से शुरु में अंग दान के लिये कॉल आया था, वही नम्बर थोड़ी देर पहले पूर्वी बारमेड़ में ट्रेस किया गया है।

सिपाही जसवंत सिंह ने फ़ौरन अपनी राय देते हुए कहा – हो न हो यह ट्रेन वाला शख्स ही है जिसके पास यह फोन है।

इरफ़ान – लेकिन जब ट्रेन से कोई यहाँ उतरा ही नहीं तो ऐसा कैसे हो सकता है?

जसवंत – सर, यह नंबर पूर्वी बारमेड़ में ट्रेस हुआ है। ट्रेन भी पूर्व दिशा से ही आती है। हो सकता है कि मुज़रिम बारमेड़ से पहले उत्तरलाई स्टेशन पर बच्चे समेत उतर गया हो और अपने साथियों के साथ संपर्क साधने के लिए उसने फोन ऑन किया हो।

इरफ़ान – उफ्फ! यह ख्याल पहले क्यों नहीं आया। तुरंत उत्तरलाई रेलवे स्टेशन अधीक्षक (एस.एस.) को अलर्ट करो और निकटतम पुलिस स्टेशन को सचेत करो। और जसवंत, उस नंबर की कॉल ट्रेकिंग जारी रहनी चाहिए। कुछ भी करके हमको इस बच्चे को बचाना है।

जसवंत – यस सर।

उसी समय एस.पी. पांडेय जी का फोन आया। सीधा सवाल था – क्या हुआ? हैज़ द कल्प्रिट बिन कॉट? लेकिन इरफान का जवाब सुनकर वह बौखला गये।

एस.पी. (कड़क आवाज़ में) – मैंने तुमको ऐसा प्लान न बनाने की हिदायत दी थी। दिस चाइल्ड इज़ गोइंग टु बी ए विक्टिम ऑफ यॉर ओवर-कॉन्फिडेंस। क्या इस बात का तुमको ज़रा भी इल्म है?

इरफ़ान – जी सर।

एस.पी. – देन कैच द कल्प्रिट्स एंड ब्रिंग द चाइल्ड अलाइव बाय मॉर्निंग । एल्स, बी रेडी टु फेस एक्शन।

यह कहकर उन्होंने फोन पटक दिया।

इस बीच बारमेड़ एस.एस. से पता लगा कि आज उत्तरलाई से बारमेड़ तक का 10 किमी. का रास्ता ट्रेन ने 40 मिनट के निर्धारित समय के मुक़ाबले सिर्फ 20 मिनट में ही तय कर लिया था इसलिए मुज़रिम के पास उतर कर भागने के लिए अब तक लगभग 35 मिनट का समय मिल चुका था। अपनी गाड़ी का रुख उत्तरलाई स्टेशन की ओर करते हुए उसने उत्तरलाई एस.एस. को फ़ोन लगाया और बात करने लगा|

तभी एक आदमी भागता हुआ उत्तरलाई एस.एस. के कमरे में पहुंचा और उससे इन्स्पेक्टर इरफ़ान को कॉल करने के लिए आग्रह करने लगा। एस.एस. ने फोन उसको पकड़ा दिया।

लाइन पर रेलवे सुरक्षा बल (आर.पी.एफ़.) का जवान रविंदर था। उसकी बातों से अब तक का शक़ यकीन में बदल गया। दरअसल, रविंदर दिल्ली स्टेशन से ही जी.आर.पी. के निर्देशानुसार सादे कपड़ों में संदिग्ध का पीछा कर रहा था। संदिग्ध, बच्चे के साथ, उत्तरलाई स्टेशन पर उतरा। उतरकर उसने पहले कुछ समय स्टेशन पर बिताया – शायद उसके साथियों को वहाँ पहुँचने में देर हो गयी थी इसलिए उसने एक बार किसी को फ़ोन किया। थोड़ी देर में एक सफ़ेद कार आई और उन दोनों को वहाँ से ले गयी जिसका नंबर रविंदर ने इरफ़ान को बता दिया|

इरफान ने थोड़ा झुंझलाते हुए पूछा – इतनी देर तक तुमने मुझे कॉल क्यों नहीं किया?

रविंदर ने बताया कि अचानक हुए इस घटनाक्रम में वह पूरी तैयारी के साथ ट्रेन पर सवार नहीं हो सका था, जिस कारण आधे रास्ते में ही उसका फोन डिस्चार्ज हो गया था। उसने आगे बताया – जब तक संदिग्ध उत्तरलाई स्टेशन पर था, वो काफी रिलैक्स्ड था। शायद उसको पुलिस के ऑपरेशन की भनक नहीं थी। लेकिन जब वह कार में बैठ कर जाने लगा तो वो (रविंदर) नर्वस हो गया और उसके हाव-भाव देख कर बदमाशो को शक हो गया। वो काफी जल्दबाज़ी में वहाँ से भाग निकले। अभी भागे हुए उनको 5 – 6 मिनट ही हुए होंगे। स्टेशन पर रिक्शा के अलावा कोई और साधन भी नहीं था, और इस असहाय स्थिति में वो उनका पीछा भी नहीं कर सकता था। इसलिये भाग कर उसने इरफान को सूचना देना ही ठीक समझा।

जिस बात का डर था, वही हो गया। रविंदर की यह चूक भारी पड़ सकती थी। लेकिन इरफान यह समझता था कि आर.पी.एफ. के जवान इस तरह के खूफिया ऑपरेशंस के लिये ट्रेण्ड नहीं होते। और फिर ओरिजिनल प्लान में उत्तरलाई की सम्भावना उसने खुद नहीं सोची थी, इसलिये वो अपने गुस्से को पी गया और बिना भड़के आगे की कार्यवाही सोचने लगा।

तभी कंट्रोल रूम से संदेश आया कि संदिग्ध ने जिस नम्बर पर कॉल किया था, वो नम्बर उत्तरलाई के एक संजीव राणा का था। उसका एक छोटा सा होटल था जिसमें कई बार गोरखधंधों की शिकायत आती रहती थी।    

एक बार फिर इरफ़ान पसोपेश में था। उसके सामने दो रास्ते थे, एक – कार को जल्द से जल्द इंटरसेप्ट करके बच्चे को बचाया जाए और फिर सबूत इकठ्ठे करके दोषियों को एक एक करके पकड़ा जाए। और दूसरा – ट्रेकिंग जारी रखते हुए आखिरी क्षण तक इंतज़ार किया जाए और ज़्यादा से ज़्यादा गुनाहगारों को मौका-ए-वारदात से रंगे हाथ पकड़ा जाए।

एक समय पासे उसकी पकड़ में आते नज़र आ रहे थे। लेकिन उसकी तैयारी बारमेड़ में थी। प्रकाश और उसके साथी उत्तरलाई में थे। अगर शिकार आपके बिछाए जाल में फंस जाए तो देर सवेर पीछा करके उसको पकड़ना मुमकिन है। लेकिन ऐसे मौके पर जब एक मासूम की जान का सवाल था, एक गलत चाल जीती हुई बाज़ी पलट सकती थी। और तो और, मामला सिर्फ हार या जीत का नहीं था। बड़ी मछली को पकड़ने के लिए क्या इतना बड़ा दांव खेलना सही था? और फिर वो कोई देश की सुरक्षा के लिये प्रतिबद्ध सिपाही तो था नहीं, एक ऐसा नादान था जिसकी सलामती के लिये दुआ करने वाली घर पर माँ तक नहीं थी।

लेकिन अगर सिर्फ प्रकाश को ही पकड़ना था तो दिल्ली स्टेशन पर ही ऐसा किया जा सकता था। इस मौके पर ऐसा करने का मतलब था किये कराये पर पानी फेरना। इस द्वन्द ने इरफ़ान के मन में एक तूफ़ान खड़ा कर रखा था। कश्म्कश की इस हालत में सब सोच विचारकर उसने तय कर लिया कि कैसे भी करके बच्चे को छुड़ाना है।

इरफान की टीम उसके अगले कदम का इंतज़ार था। इरफान ने फौरन उत्तरलाई पुलिस स्टेशन को सम्पर्क किया। इतने कम समय में नाकाबंदी तो की नहीं जा सकती थी इसलिये किस्मत आजमाते हुए उसने राणा के तीनों अड्डों – घर, होटल और गोदाम – पर उसी वक्त धावा बोलने को कहा। वायरलेस पर सभी पुलिस कर्मियों को सचेत किया गया कि जिस भी एरिया में उसी रंग रूप वाली ग़ाड़ी दिखे, फौरन इंफॉर्म करे। वो खुद होटल की ओर बढ़ने लगा। उसको शक़ था कि प्रकाश बच्चे को होटल ही ले जायेगा। थोड़ी देर में वायरलेस पर सूचना आई कि अपराधियों की गाड़ी राणा के होटल की ओर बढ़ते देखी गयी है।

फिर क्या था, इरफान और उसकी टीम ने थोड़ी ही देर में होटल को घेर लिया। और हल्के प्रतिरोध के बाद प्रकाश और उसके दो साथियों को काबू कर लिया।    

बच्चे को होश में लाया गया। उसका नाम श्याम था। मुजरिमों से पूछताछ के दौरान कई लोगों का नाम सामने आए, कुछ के खिलाफ सबूत मिल गए लेकिन कुछ बाइज़्ज़त बरी हो गए।

हांलाकि श्याम की जान तो बच गयी, लेकिन इरफ़ान के इस फैसले से क्या कालू को इन्साफ मिल पाया? ऐसे ही कुछ सुर्खियां और सम्पादकीय बारमेड़ के अखबारों में भी छपे। और इरफान को इसका ज़िम्मेदार भी ठहरा दिया गया। जनता ने भी पुलिस के आरामपरस्ती की गाथाएं गाना शुरु कर दिया। क्यों? क्योंकि सबको सिर्फ परिणाम पता था। उस परिणाम के पीछे का फैसला पता था। लेकिन फैसले के पीछे के हालात सिर्फ चंद लोगों को ही पता थे।

                                                                    *****

इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं। लेकिन इसका हर किरदार वास्तविकता की एक जीती जागती मिसाल है। सैकड़ों प्रकाश अपने चरित्र की कालिमा से सैकड़ों कालुओं को निगलते हैं। न जाने कितने इरफान अपनी जान पर खेल कर किसी के सपनों को टूटने से बचाते हैं लेकिन फिर भी निंदा के पात्र बनते हैं।

  • अश्रु
50 kg

साढ़े तीन सौ एण्ड काउंटिंग…

साढ़े तीन सौ एण्ड काउंटिंग… 

आइए शुरुआत करते हैं कंजूसी की एक लघु कथा से|

कभी न कभी तो आप बचपन में मम्मी पापा के साथ शहर में घूमने गए होंगे| आजकल का तो हम नहीं जानते लेकिन हमारे बचपन में तो अगर घर से बाहर, स्कूल के इतर, कहीं जाते थे तो उसको घूमने की संज्ञा दी जाती थी| एक पंथ, तीन काज हो जाते थे – हमारा घूमना, घर के सामान की खरीददारी और माता पिता को बोझा उठाने वाला एक आदरणीय सहायक फोकट में मिल जाता था|

अंदाज़न पंद्रह साल पहले कभी हम भी ऐसे ही शहर घूमने गए थे| खुद के लिए कुछ लिया या नहीं, यह तो याद नहीं लेकिन घर में कपड़े धोने के लिए एक, एक किलोग्राम सर्फ अल्ट्रा डिटर्जेंट पाउडर का डिब्बा ज़रूर लिया गया था| बड़े सम्मान के साथ घर लाये गए इस डिब्बे को ‘वॉशरूम’ के बाहर स्थित खिड़की पर सहेज के रख दिया गया| दिन बीतते गए, वो डिब्बा खाली होता गया और मेरे जहन से वो डिब्बा जाता रहा|

कुछ समय बाद पढ़ाई के सिलसिले में और फिर नौकरी की फिराक में मेरा अपने ही घर से विस्थापन हो गया| ऐसा नहीं कि मैं मंगल ग्रह पर चला गया था| लेकिन वही दो चार दिन के लिए ही घर आना जाना होता रहा| बारह साल बाद जब हमारी कुछ दीर्घावधि के लिए घर वापसी हुई तो एक दिन हमने घर के उस सदस्य के दर्शन किए जिनका आगमन मेरे ही कर्मठ हाथों से हुआ था| जी सही पकड़े – श्री श्री सर्फ अल्ट्रा डिब्बा जी महाराज आज भी मौजूद थे| घोर कलियुग, मानव तो मानव, मानवकृत वस्तुएं भी ‘कुर्सी’ छोडने को राजी नहीं| जैसे वृद्धावस्था में बाल सफ़ेद हो जाते हैं, तो इन महाशय के भी शरीर से छपाई के रंग ढल चुके थे – नीचे से वृद्धावस्था का श्वेत वर्ण उजागर हो रहा था| पहचान तो मैंने लिया था लेकिन फिर भी माता श्री से पुष्टि की कि यह वही डिब्बा है|

कुछ हैरानी, कुछ शरारती अंदाज़ में मैंने उनसे पूछा कि ऐसा भी क्या खास है जो आज तक एक डिब्बा नहीं फेंका? उन्होंने करारा जवाब देते हुए कहा – बेवकूफ़, हम हर बार नया पैकेट लाते और इसी डिब्बे में पलट देते हैं| इसमें न तो पाउडर नमी पकड़ता है न कोई और दिक्कत होती है| लेकिन तुम ठहरे नए जमाने के लापरवाह, चीज़ें संभाल कर रखना तुमको कहाँ से आएगा|

व्यंग्य तीखा था, एक ही बाण में उन्होंने मेरे दाँत खट्टे कर दिये थे| एक मोटा अनुमान लगाकर मैंने आगे कहा – अम्मा, अगर दो किलोग्राम प्रति माह की दर से भी डिटरजेंट पाउडर इस्तेमाल हुआ होगा तो 15 साल में कम से कम साढ़े तीन कुंटल पाउडर घर में आया| सारा का सारा इस एक ही डिब्बे में तुमने पलटा – यह तो एक गैरमामूली कारनामा है| अगर हिंदुस्तान यूनिलीवर वालों को तुम्हारी इस वीर गाथा का पता चला तो अवश्य ही वो भी अपने इस सबसे लंबे चलने वाले डिब्बे दर्शन हेतु और तुमको सम्मानित करने आएंगे|

हँसते हुए मैंने उस समय तो बात को टाल दिया लेकिन दिमाग में पीछे कहीं यह वाकया घुमड़ता रहा| पर्यावरणविद कहते हैं कि प्लास्टिक अच्छा है लेकिन प्लास्टिक की बर्बादी बुरी है| कभी मांग उठती है तो प्लास्टिक पर पाबंदी लग जाती है| फरमान जारी हो जाता है कि कि बाज़ार में फल सब्जी आदि पन्नी में नहीं बिकेगी| बड़ी दुकानों पर जाएंगे तो बड़ी विडम्बना देखने को मिलती है| कल तक वो प्लास्टिक में सामान बेचते थे| प्लास्टिक प्रतिबंधित होते ही, सामान के साथ वो इको-फ्रेंडली लिफाफा भी बेचने लगते हैं| कसम से, रु.10000/- मूल्य चुकाने में कष्ट नहीं होता लेकिन साथ में जब कोई विक्रेता रु.10/- अलग से मांगता है तो बड़ी तेज़ टीस उठती है| सवाल उठता है कि पर्यावरण बचाने का ठेका सिर्फ खरीद दार का ही है, मुनाफा कमाने वाले दुकान दार का इसमें कोई उत्तरदायित्व नहीं? होना चाहिए|

लेकिन अगर आपने मजबूरी में क्रोध को शांत कर भी लिया तो ज़रा ध्यान से देखिये – आपके पर्यावरण को बचाने का यह प्रयास तत्क्षण विफल हो चुका होता है| क्यों? क्योंकि, आपके इको-फ्रेंडली थैले में आनिवार्यतः प्लास्टिक में लिपटा दूध, बिस्किट, चिप्स, अनाज या फिर सर्फ एक्सेल (आज का नाम) का पैकेट होता है| जैसे ही आप की यह प्लास्टिक की पन्नी बद्ध सामान खत्म होते हैं, आप इनके रैपर को सहजता से फेंक देते हैं और यह अक्सर किसी चोक होते नाले अथवा किसी जानवर के पेट में या मिट्टी की आगोश में और बहुत हो गया तो लैंड फिल में स्थान ग्रहण करता है| और अगर आपका शहर अधिक स्मार्ट हुआ तो यह री-साइकलिंग प्लांट पहुँच जाता है, लेकिन भैया, क्या री-साइकलिंग में ऊर्जा नहीं खपती? अगर आप ऐसा हर सामान पन्नी की जगह डिब्बे में बेचना शुरू कर दें तो क्या करेंगे इतने सारे दीर्घायु डिब्बों का? वृद्धाश्रम खोलना पड़ेगा सबके लिए|

अब सवाल उठता है क्या कुछ हो सकता है प्लास्टिक की इस किस्म की खपत को कम करने के लिए? यहाँ मुझे याद आता है मेरी माँ का आँखों का तारा वो सर्फ अल्ट्रा का डिब्बा और इंडियन ऑयल का पेट्रोल पंप| मतलब – सर्फ एक्सेल वाले ऐसी बड़ी दुकानों में पेट्रोल पंप की मशीन की ही भांति डिटरजेंट पाउडर की मशीन लगा दें और हर ग्राहक अपना अपना सर्फ का दीर्घायु डिब्बा लेकर पहुँच जाये तो मशीन से मनचाही मात्रा या मूल्य भर का उत्पाद निकाल सकता है| इस तरह दोनों हाथों से ताली बजाने से साल भर में करोड़ों पॉलिथीन की खपत और उनका गैर जिम्मेदाराना निपटारा कम हो सकता है|

लेकिन, थोथा चना बाजे घाना| बड़े आए हम आइडिया देने वाले| क्या नुवो-रीश मध्यम वर्ग दुकान में कटोरा ले जाते हुए तौहीन नहीं महसूस करेगा? शायद मैं खुद भी जाना पसंद न करूँ| हम दोगुना दाम दे सकते हैं, लेकिन पर्यावरण के बचाव में यह ज़िल्लत नहीं झेल सकते| डूड, दिस इज़ एटिट्यूड|

लेकिन अगर कोई मुझे बार बार यह ‘प्रलोभन’ दे कि खुद का डिब्बा लेकर दुकान जाने से आप पैसे और पर्यावरण, दोनों की बचत कर सकते हैं और एक जिम्मेदार पर्यावरण मित्र बन सकते हैं – जैसे दिल्ली मेट्रो ने मेट्रो कार्ड को बढ़ावा देने के लिए समय और पैसा बचने की बात समझाई – तो शायद मेरे जैसा जिद्दी इंसान भी अपनी इज्ज़त से समझौता कर ले| आखिर कार, दैट इज़ कूल|

अब देखिये हमने तो कह दिया| और यह भी सत्य है कि यथास्थिति बनाए रखना सर्वप्रिय है| माँ के गर्भ में भले ही बच्चा सिकुड़ा पड़ा रहे लेकिन बाहर रोते हुए ही आता है|

कोई भी विचार अच्छा या बुरा हो सकता है| दाग को हमेशा बुरी नज़र से ही देखा जाता रहा, लेकिन सिर्फ तब तक  जब सर्फ एक्सेल वालों ने नहीं समझा दिया कि दाग अच्छे हैं|

तो ज़रा इस पर भी गौर फरमायें|

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  • अश्रु

 

इति श्री पर्यावरण श्रृंखला का तृतीय अध्याय समाप्त

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लखनऊ का बड़ा मंगल!

लखनऊ का बड़ा मंगल!

उम्मीद है कि हनुमान जी को तो आप जानते ही होंगे| अरे मिले तो हम भी नहीं लेकिन वही हनुमान भगवान जिनके नाम मात्र से भूत पिशाच निकट नहीं आवें….| तुलसीदास जी की मानें तो हनुमान जी का डंका भू, गगन और पाताल तक में बजता है (तीनों लोक हाँकते काँपें…) जो भी हो, उनके मंदिर और भक्त सारे भारतवर्ष में बड़ी संख्या में पाये जाते हैं| लेकिन लखनऊ शहर से हनुमान जी का अति-विशिष्ट रिश्ता है| क्योंकि इस शहर में हनुमान न सिर्फ पूजनीय हैं बल्कि हरमनप्यारे, कौमी एकता का भी प्रतीक हैं| ज्येष्ठ माह का हर मंगलवार यहाँ बड़ा-मंगल के रूप में मनाया जाता हैं| और इसके पीछे भी एक बड़ा रोचक तथ्य है|

कहते हैं कि आज से कुछ शताब्दी पहले अवध के नवाब का बेटा गंभीर रूप से बीमार हो गया| औलाद अगर कष्ट में हो तो माँ पर जो बीतती है उसका कोई सामी नहीं| कुछ भी कर के वो बस अपनी संतान की सलामती चाहती है| जब हकीमों और वैद्यों ने हाथ खड़े कर दिये तो बेगम अपने बेटे को लेकर अलीगंज के हनुमान मंदिर पहुंची| वहाँ के पुजारी ने कहा कि अपने बेटे को रात भर के लिए मंदिर छोड़ जाए| अगले दिन जब उसने अपने बेटे को     पूर्णतः स्वस्थ पाया तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा| इस चमत्कार के चलते नवाब ने उस माह के हर मंगलवार को बड़ी धूम धाम से मनाया और तब से ही लखनऊ में ज्येष्ठ माह का हर मंगलवार बड़ा हो गया| हर धर्म के अनुयायी बड़े मंगल के आयोजन में हिस्सा लेते हैं| भीषण गर्मी में भूखे को भोजन, प्यासे को पानी और दुखी को मीठे बोल मिल जाएँ तो वाकई वो दिन बड़ा ही होगा|

काफी अरसे बाद मुझे भी लखनऊ में ज्येष्ठ माह बिताने का सौभाग्य प्राप्त हुआ| पहला बड़ा मंगल अभी कुछ दिन दूर था लेकिन अखबारों में उसके इंतेजामात को लेकर सुर्खियां बनी हुई थीं| सूरज उगते ही ‘मंगल’ बड़े होने का बिगुल बजा देता| सुबह से ही लाउडस्पीकरों पर भक्त कुछ सुरीले, कुछ बेसुरे और कुछ बेतुके गाने बजा कर समा बांध देते| जगह-जगह पंडाल लगाकर, भोजन सामाग्री तैयार करने में जुट जाते| प्याऊ भी मुस्तैद हो जाते| दोपहर होते ही हर पंडाल पर लोगों का तांता लगना शुरू हो जाता| और आखिर क्यों न हों? कहते हैं कि भंडारे में भोग लगाना शुभ होता है और भंडारा आयोजित करना पुण्य अर्जक होता है| और अगर कलियुगी दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह एक उत्तम निर्णय है – एक तो भोजन, दूसरे शुभ और शुद्ध (प्रसाद स्वरूप) और तीसरे – असीमित और बिलकुल मुफ्त मिल रहा हो तो किसी को पुण्य कमवाने में क्या जाता है? इसलिए ऐसे मौकों पर लोग आपको पुण्य कमवाने के लिए लालायित रहते हैं| कई तो नाश्ते तक का बलिदान कर देते हैं| कभी लखनऊ आकर पुण्य कमाना हो तो इससे बेहतर मौका नहीं मिलेगा|

खैर, मैं जब दोपहर में घर से निकला तो रास्ते में दर्जनों भंडारे लगे हुए थे| भीषण गर्मी के बीच चारों ओर हर्षोल्लास का माहौल था| हर जगह लोग बड़ी तादाद में भंडारे के आयोजकों की पुण्य-प्राप्ति की मुहीम में सहयोग देने के लिए उमड़े हुए थे| ईश्वर की महिमा देखिये, बड़े से बड़ा स्वाभिमानी व्यक्ति भी ईश्वर के पर्व पर हाथ फैलाकर खाना मांगने में संकोच नहीं करता| लेकिन आसमान छूते पारे में, खुले आसमान के नीचे, गरमा गरम पूड़ी सब्जी का भरपेट भोग लगाना भी कोई आसान काम तो है नहीं, इसलिए कुछ श्रद्धालु अपने सगे संबंधियों को घर छोड़ आये| लेकिन काहे वो भंडारे का भोग खाकर आशीष पाने से वञ्चित रह जाएँ? शायद इसलिए वो अपने साथ एक बड़ा सा बर्तन लाना नहीं भूले|

गंतव्य पर थोड़ा लंबा समय लग गया और लौटते समय तक अंधेरा हो चला था| मन तो मेरा भी बहुत था लेकिन भंडारे में भोग लगाने के लिए भी कुछ अच्छे कर्म किये होने चाहिएं| न पुण्य कमा सके न किसी बंदे को कमवा सके| खैर, लौट के बुद्धू घर को आए|

अगली सुबह तड़के जब मैं अर्धसुप्तावस्था में घर से निकला, तो एक ‘अद्भुत’ दृश्य देख के दंग रह गया। मैंने आँखें मलते हुए गौर से देखा तो प्रतीत हुआ मानो जगह-जगह बर्फबारी हुई है। यह चमत्कार अमूमन हर उस स्थान पर ही हुआ था जहाँ-जहाँ बड़ा-मंगल मनाया गया था। एक पल को तो मैं समझ बैठा कि हनुमान जी ने अपने भक्तों पर कृपा बरसाई है, तभी ज्येष्ठ की दारुण गर्मी में शीतलता भरी हिम अवतरित हुई है। या फिर गणेश जी ने उत्सुक होकर बुधवार को बड़ा करने के लिए चमत्कार दिखाया है।

लेकिन सूरज की तपिश भरी किरणों ने मुझे आभास कराया कि यह कोई साधारण बर्फ नहीं थी और न ही यह हनुमान जी का चमत्कार था। यह तो भक्तों की कठिन साधना का नतीजा था। और तो और लखनऊ ही नहीं, भारत के तमाम शहरों के लिए ऐसी बर्फबारी होना आम बात थी| आखिर श्रद्धा सिर्फ लखनऊ में ही नहीं बसती| दरअसल, वो बर्फ थी थर्माकोल की| भंडारे में प्रयुक्त – कप, प्लेट और कटोरियों के चहुं दिशाओं में अंबार लगे थे|

मैं आगे चलता गया और किसी चलचित्र की भाँति आगे की घटनाएं दिखती चली गयीं। देखते ही देखते सफाई कर्मचारियों ने अपना कर्त्तव्य निभाना आरम्भ किया। पहले तो उन्होंने बिखरे हुए थर्माकोल के बर्तनों को एकत्र किया और फिर उनका होलिका दहन कर दिया। यह अग्नि हवन कुंड की नहीं थी जो हवा को शुद्ध कर रही हो अपितु कई कुंटलों जलते हुए थर्माकोल से निकलने वाली विषाक्त ज्वाला थी।

मुझे याद आया कि एक ज़माने में ऐसे मौकों पर ‘पत्तल’ का प्रयोग होता था। अगर फेंक भी दो तो कुछ समय में खाद बन जाता था। आजकल न जाने क्यों वो ‘आउट ऑफ़ फैशन’ हो गया! कहीं इसलिए तो नहीं कि पेड़ कम रह गए हैं और भक्तों की तादाद ज़्यादा हो गयी है? या फिर कंसम्पशन पर आधारित नवीन अर्थव्यवस्था में सफाई से बनने वाले उत्पादों की कोई जगह नहीं है? फिर मेरी नज़र पास बैठे दुखिया और अब्दुल पर पड़ी| कल तो उनको खाने के लिए प्रचुर मात्रा में भोजन मिल गया, लेकिन आज दोनों मुंह बिचकाए बैठे थे| उनके लिए अगले बड़े मंगल या मोहर्रम या शहीदी दिवस का इंतज़ार शुरू हो गया था| अजीब विडम्बना है, कि पुण्य कमाने के लिए हमारे दिन भी तय हैं| सब लोगों को इन ही गिने चुने दिन भंडारे-प्याऊ लगाने हैं| यह बताइए कि हनुमान जी या खुदा किस बात का आशीर्वाद देते हैं? भूखे को खाना खिलाने के लिए या गिने चुने दिनों में ही भूखे या नहीं भी भूखे को पकवान खिलाने के लिए? अगर साल के हर दिन आप ज़्यादा नहीं सिर्फ किसी एक का पेट भरने की बात तय कर लें तो शायद हनुमान और खुदा अधिक मेहरबान होंगे| लखनऊ के चंद दिन ही बड़े न कहलाकर हर दिल बड़ा कहलाने लगेगा|

मैं यह सब फालतू की बातें सोच ही रहा था कि उस दुर्गन्ध के बीच मेरी नज़र हनुमान जी पर पड़ी। अच्छे स्वास्थ्य का वर देने वाले हनुमान, जो सीना चीर कर सीता-राम के दर्शन कराते नज़र आते थे, अपने सीने में राम-सीता को वापस छुपाते हुए नाक-मुंह ढकते हुए अपनी सेहत बचाने की कोशिश कर रहे थे। मैंने नतमस्तक होकर प्रणाम किया तो आशीर्वाद भी न दे सके।  उनकी प्रतिमा के बगल में ही स्वच्छ भारत अभियान और विश्व पर्यावरण दिवस के पोस्टर झूल रहे थे| यही  हाल रहा तो हनुमानजी कहीं देश छोड़ कर सुमेरु वापस न चले जाएँ।

                                                                     *******

  • अश्रु

|| इति श्री पर्यावरण दिवस शृंखला का द्वितीय अध्याय समाप्त ||  

 

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प्रायश्चित

प्रायश्चित

क्षमा करें कि बिन बताए कहीं चला गया था| दरअसल, प्रायश्चित करने लगा था। आप पूछोगे किस पाप का?

हुआ यूँ कि हम ज़रा ख़ाक छानने निकल गए थे और तो और, गए भी थे पैदल| आप कहेंगे कि इससे सुहाना मौसम नहीं मिला कहीं घूमने के लिए? लेकिन कभी कभी विवशता – धर्म निभाना पड़ता है, क्या करें? वैसे तो रास्ते की लंबाई मीलों में मापी जाती है लेकिन तापमान बढ़ने से दूरियाँ भी बढ़ जाती हैं| पाँच मील का फासला पचास कोस जैसा लग रहा था| भरी दोपहरी में, कटाई के बाद उजाड़ पड़े खेत मानो आग उगल रहे थे| अभी आधा रास्ता ही चले होंगे कि दम लेने के लिए रुकना पड़ा|

खेतों के बीचों बीच एक आलीशान, छायादार वृक्ष दिखाई दिया| उसकी छांव में कुछ समय बिताकर चलने लगे तो अचानक आवाज़ आयी – – जा रहे हो?

मैंने घूम के देखा लेकिन कोई दिखाई नहीं दिया, सिवाय उस पेड़ के। मुझे लगा गर्मी से मेरा दिमाग खराब हो गया है और आगे बढ़ने लगा लेकिन, तभी दोबारा आवाज़ आयी …. मैं ही हूँ।

वो पेड़ मुझसे बात कर रहा था!!! शक्की मानव मति ठहरा, मुझे लगा कहीं ये किंवदंति वाला नरभक्षी वृक्ष तो नहीं, मैंने हैरान होकर पूछा – आप बोल सकते हैं? एक अल्प विराम के बाद उसने कहा – और भी बहुत कुछ कर सकते हैं।

मैंने कहा – आप तो बड़े मायावी वृक्ष लग रहे हैं, कितनी उम्र है आपकी?

बड़े ही खिन्न स्वर में जवाब मिला – यह तो तुम मुझे काट के भी जान सकते हो, आओ चीर दो मुझे भी आरी से….

उसके स्वर में कटाक्ष को भांपते हुए मैंने बात को सम्भालते हुए कहा – नहीं नहीं, मेरा वो मतलब नहीं था। मेरा आशय सिर्फ इतिहास का आँखों देखा हाल जानने का था।

आपने तो बहुत दुनिया देखी होगी, कोई किस्सा सुनाइए इस बारे में..बताइए हमको भी|

वो बोला – हाँ मैंने धरती पर स्वर्ग और स्वर्ग को नर्क बनते हुए देखा है|

यहीं खड़ा, बुत बना| प्रत्यक्षदर्शी|

सुनना चाहते हो एक कटु लेकिन सत्य कथा?

एक समय था जब मैं नहीं था अकेला, लगा था मेरे साथियों का भी रेला|
न था आकार - न प्रकार, रंग - न अंग, जाति - न प्रजाति का भेदभाव वहाँ,
सबहूं से थी दोस्ती, न काहू से बैर था वहाँ
था वसुधैव कुटुम्बकं, सब का था सु-स्वागतम!
कहीं होते थे बौर खिले, तो कहीं लदते थे फल जहाँ,
न रहती भूख न थी प्यास वहाँ
मिट्टी में बसती सुगंध थी, फ़ैली रहती जहाँ तहाँ|
जीवंत हो जाता था भू-मंडल जब मिल जाते थे सब यार यहां|
मगर अब देख ये है श्मशान भूमि, सपाट, फ़ैली अवशेषों की राख यहाँ!

 श्मशान, वो कैसे?

एक दिन एक आगन्तुक आया, जिसे यह चमन कुछ अधिक ही भाया।
मगर शायद यह सौहार्द्र रास न आया।
सबने तो उसका सहर्ष सत्कार किया, पर उसने कुछ और ही पुरस्कार दिया।
फिर लगा वो चाकू टेने, करने हथियार पैने।
फिर उसने जो कोहराम मचाया, किसी को तीर तो किसी को तलवार से सुलाया,
किसी को कलमकर, तो किसी को ज़िंदा जलाया।
जीवमुंड का मुकुट पहन, तरु भस्म को अंग लगाया।
तब जाके बिन प्रजा के उस हत्यारे ने साम्राज्य बसाया।
हाँ वो मनुष्य था, वो मनुष्य था।

मगर बाबा, यह धरती तो हमारी माता है! हमारी अन्नदाता है। यह न हों तो क्या होगा मनुष्य का? कहाँ जाएगी सभ्यता? वो ताने भरी हंसी मुस्काया – सभ्यता, क्या प्रेयोक्ति है!

अपने को सभ्य कहने वाले ऐ हत्यारों के प्रतिनिधि,
कौन रहना चाहता है यहाँ पर, बता सकते हो दयानिधि?
अरसे से तुमने इस माटी में विष ही तो घोला है,
लालच के वश में आकर माँ को बंजर करके छोड़ा है।
लगा है दोहन में निर्मम, तू पूत नहीं बिचौला है।
बड़ा आया मुझे समझाने, तूने कितना मनुष्य को देखा है?
मुझसे पूछ, मैंने एकटक साम्राज्यों को बनते बिखरते देखा है।
मूक खड़ा हूँ नहीं मैं मुर्दा, अपनों को मैंने खोया है।
रोया हूँ पर मेरे अश्रु को तूने पानी ही तो समझा है!
मैं तो खुश था तुझे देखकर कि आज मिलेगी मुझे विमुक्ति
उठा अस्त्र और कर दे हत्या….आज तुझे किसने रोका है?

क्षमा वृक्ष देवता क्षमा!! 

मद में चूर अपने दुष्कर्मों का किया नित्य महिमा मंडन है।
योग्य नहीं हूँ मैं क्षमा के, फिर भी, विनम्र निवेदन है,
हे शिरोमणि! नहीं मिथ्या ये क्रन्दन, ये पश्चाताप के अश्रु हैं!
करें स्वीकार प्रायश्चित को, मेरा यह आवेदन है।
आपसे हैं हम, हैं आप हमारे मूलाधार,

थी विस्मृति इस अखण्ड सत्य की, आज हमें आलिंगन है।
थी विस्मृति इस अखण्ड सत्य की, आज हमें आलिंगन है।

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पर्यावरण दिवस को समर्पित!

  •  अश्रु
सुल्तान का मकबरा

सुल्तान का मक़बरा

                          सुल्तान का मक़बरा

वैसे तो हमारा दिल्ली आना जाना लगा रहता है लेकिन इस शहर के अजूबे हमको कभी हैरान करते नहीं थकते| उस बार जब हम दिल्ली गए तो एक बड़े ही अज़ीज़ दोस्त से मिलना तय हुआ और मुलाकात की जगह भी लोधी गार्डन मुक्कमल हुई| इत्तेफ़ाक़ से इतिहास और आर्किटेक्चर में हम दोनों की दिलचस्पी किसी आम आदमी से ज़्यादा थी और इस लिहाज से लोधी गार्डन एक ऊम्दा जगह थी| दिल्ली में मौजूद सैकड़ों ऐतिहासिक इमारतों और इलाकों में से एक, यह स्थल हिन्दु-इस्लामी निर्माण पद्धति का बेहतरीन नमूना है|

लोधी गार्डन मौजूदा दिल्ली के एक आलीशान इलाके में है जिसका निर्माण और विस्तार पन्द्रहवीं शताब्दी में तख्त पर काबिज लोधी वंश के सुल्तानों की ‘देख-रेख’ में हुआ| यहाँ मौजूद आलीशान मक़बरे और तीन गुंबद वाली मस्जिद के चारों ओर शांत माहौल का लुत्फ उठाने बड़ी संख्या में दिल्ली वासी और यहाँ तक कि बाहर से भी सैलानी आते हैं|

हांलाकि दिल्ली की मशहूर सर्दी का जमा देने वाला दौर बीत चुका था लेकिन उस रोज़ सूरज को बादलों ने अपनी आगोश में छिपा लिया था| ऐसे में जब हवा के झोंके छूते तो हल्की सिहरन सी उठ रही थी| मुख्य द्वार से दाखिल होकर हम थोड़ा आगे बढ़े तो सबसे पहले मरहूम मुहम्मद शाह के मक़बरे ने हमारा रास्ता रोका| ज़मीन से काफी ऊंचाई पर बलुआ पत्थर से बना यह विशाल मकबरा हमारे सामने था| लेकिन एक सुल्तान के मक़बरे के लिहाज से यह काफी सादगी भरा दृश्य था| या तो सुल्तान बड़े सादगी पसंद थे या फिर समय ने उनके साथ साथ उनके इस आराम खाने को भी नहीं बख्शा|

लेकिन सादगी भी बड़ी नायाब चीज़ है, जो कंक्रीट के जंगलों में रहने वाले हम जैसों को अपनी ओर खींचती है| और नायाब इसलिए भी है कि कभी कभी सादगी दिल में छिपे कलाकार को भी जगा देती है| मक़बरे के चारों तरफ अंदर जाने के लिए सीढ़ियाँ हैं| हमारे सामने वाली सीढ़ी पर एक बेहद हसीन नज़ारे ने हमको रुकने पर मजबूर कर दिया| सीढ़ी के हर कदम पर एक परिवार के अनगिनत सदस्य किसी फिल्म का सीन दोहराते हुए फेसबुक के लिए कैमरे में कैद कर रहे थे| उनको परेशान किए बगैर हमने दूसरे रास्ते से अंदर दाखिल होने की सोची तो हद ही हो गई| वहाँ एक नव-विवाहित युगल पृष्ठभूमि में मक़बरे को रखते हुए बड़ी रोमानी मुद्रा में चलचित्र बनवा रहा था|

आगे बढ़े तो तीन-गुंबद वाली मस्जिद दिखाई दी| मस्जिद के दोहरे मेहराब दार दरवाजों पर बड़ी शिद्दत से अरबी में कुछ कुछ उकेरा हुआ था| शायद अब यहाँ नमाज़ तो अदा नहीं होती लेकिन चारों ओर की हरियाली और चहल पहल देखते ही बनती है| यह दृश्य देख मुझे अपने बचपन के दिन याद आ गए जब कभी हम भी अम्मा पापा के साथ किसी पार्क जाया करते थे| और आगे बढ़े तो लोधी गार्डन की शान – सबसे आलीशान – मरहूम सुल्तान सिकंदर लोधी का मक़बरा दिखाई दिया|

अफसोस कि उस समय मक़बरे के बंद होने का समय हो चुका था इसलिए बाहर से ही तसल्ली करनी पड़ी| हमसे पहले से वहाँ एक बुजुर्गों का दल मौजूद था| उनकी बातें सुनकर लग रहा था कि उनमें से कुछ भारत से बाहर से थे और बाकी लोधी गार्डन के रेगुलर विजिटर थे| किसी की बातें सुनना बुरी बात होती है और सुनकर उसपर व्यंग्य करना तो किसी अपराध से कम नहीं| लेकिन यह दोनों अपराध करने के लिए हम मजबूर थे| पहला अपराध यूं हुआ कि बचपन में सीखा शराफत का एक पाठ हमको याद था – कि जब बड़े आपस में बात कर रहे हों तो बीच में नहीं बोलते| अब ज़बान पर तो हमने ताला लगा लिया लेकिन कानों में उंगली तो डाल नहीं सकते थे, तो बड़ों की बात हमको सुनाई दे ही गई| लेकिन मैं यह कबूल करता हूँ कि इस शराफत में कुछ शरारत भी शामिल थी जो हम दोनों के मुंह पर न रुकने वाली हंसी बयान कर रही थी| इसलिए अजनबी आंटी, गुस्ताखी माफ़|

अब मान लीजिए कि कोई सात समंदर पार करके आपके शहर आए और आपसे शहर घुमाने की गुजारिश करे तो आप क्या करेंगे? शायद आप खुद ही ऐसा करने की पेशकश करेंगे और अपने शहर की हर बात को थोड़ा बढ़ा चढ़ा कर बताएँगे| बस ऐसे ही जोश की शिकार हमारी अजनबी आंटी भी थीं| वो अङ्ग्रेज़ी में कुछ ऐसा कह रही थीं कि मक़बरे के सामने की सुंदर घास और हरियाली सुबह सुबह इतनी बढ़िया “प्राणवायु” उत्सर्जित करते हैं कि उनके अंदर दिन भर के लिए प्राण फूँक देते हैं| मेरे मन में आया कि बोलूँ – शुक्र है सुल्तान प्राणायाम का शौक नहीं रखते, नहीं तो दिक्कत हो जाती| वो कुछ और कहतीं, लेकिन उनकी नज़र हमारे शरारती चेहरे पर पड़ गई और अपनी बात वहीं खत्म कर वो अपने दल के साथ आगे बढ़ गईं|   

शाम हसीन थी और मौसम खुशनुमा था| लेकिन वक़्त से ज़ालिम और ख्याल से बेबाक कोई चीज़ नहीं होती| वक़्त बता रहा था कि रुख्सत का लम्हा आ चुका है| और ख्याल अकेले में ही ज़्यादा घेरते हैं| 

मैंने सोचा कि अगर मैं भी एक सुल्तान होता और मेरा भी कोई मक़बरा बनवाता तो क्या मेरी रूह को सेलफ़ी खिंचाते, हनीमून मनाते, इठलाते लोग गवारा होते? मेरे कब्र पर आने वालों से मैं ज़ियारत की दरकार रखता न कि अठखेलियाँ करते मजमे को बर्दाश्त करता| लेकिन फिर मैंने सोचा कि यह तो मैं सोच रहा हूँ, मेरे जीते जागते जिस्म का दिमाग सोच रहा है| जो वैसा ही सोचता है जैसा दुनिया का दस्तूर होता है| क्या मालूम कि रूहों को क्या पसंद है? अगर किसी के कब्र पर आकार लोगों को खुशी मिलती है तो ज़रूर रूहों को भी खुशी ही मिलती होगी! आखिर वलियों की मज़ारों पर भी तो लोग सुकून तलाशते ही पहुँचते हैं! फिर तो सुल्तान सिकंदर लोधी किसी वाली से कम हैं क्या?

घर लौटकर मैंने सुल्तान का इतिहास खंगाला| जो बातें सामने आयीं वो कोई दिलचस्प नहीं थीं| जीते-जी उनकी निर्दयता और असहिष्णुता के चर्चे आम थे| यकीनन आवाम उनसे खौफ़शुदा थी| उनके सामने अपना हक़ मांगने से भी लोग कतराते होंगे और सामने मज़ाक करना तो अपनी मौत को दावत देने के बराबर रहा होगा| मरने से पहले उनहोंने कभी सोचा ही नहीं होगा कि मौत के करीब पाँच सौ साल बाद उसी जमीन की आवाम उनकी कब्र पर सजदा न करके सेलफ़ी खींचेगी| अगर सुल्तान आज फिर ज़िंदा हो जाएँ तो एक-एक का सिर कलम कर दें| लेकिन, …… वक्त से ज़ालिम और कोई नहीं|

तब वक़्त सुल्तान का था, आज वक़्त आवाम का है| ज़िंदा रहते तो उनहोंने सिर्फ सजाएँ ही सुनाईं लेकिन आज रूहानी सुल्तान की कब्र पर आने वाला हर कोई अपनी खुशी खुद ही छीन लेता है| आज भी तो तख्त पर काबिज कई सुल्तान हैं – आज वो जो कर रहे हैं उनके बस में है| लेकिन कल अपने लाख चाहते हुए भी ज़ियारत नसीब नहीं होगी| उनसे तो लाख गुना बेहतर वो फकीर हैं जिन्होंने जीते जी कभी किसी को पास आने से न रोका और देखो आज न चाहते हुए भी उनकी याद में लोग सजदा भी होते हैं और बरसों से उर्स भी लगा करते हैं| 

शुक्र है मैं आवाम हूँ, सुल्तान नहीं!

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– अश्रु